(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 92

77

श्री एच.वी. कामथः मैंने कहा, मेरे माननीय मित्र ठाकुर दास भार्गव ने जो समय लिया, उससे कम समय मैंने लिया है।

मैं सम्पत्ति के बारे में बोल रहा था। सम्पत्ति के आवंटन का आधार वह सिद्धांत था, जिसे शकुन्तला को विदाई देते समय, कण्व ने अभिव्यक्त किया था। कण्व ने कहा थाµ

फ्अर्थो हि कन्या परक्रिया ऐव तमद्या सम्प्रेश्य परिग्रहीताः

जातो ममायेम विश्व दः परकमम् प्रत्यर्पितरस्य-इवन तख्यो।य्

प्रथम पंक्ति, ‘अर्थों ही कन्या’ का अर्थ यह नहीं है जैसाकि शब्द प्रति शब्द अनुवाद किया जाता है कि कन्या किसी अन्य की सम्पत्ति है। इसका अर्थ यह है कि कन्या अपने पिता के घर से अलग हो जाती है, जब उसका विवाह हो जाता है। यही वह आधार था जब वह दूसरे परिवार में चली जाती है। प्राचीन काल से तब वैदिक और बाद के काल में बेटी को सम्पत्ति में कोई भाग नहीं दिया जाता था, परन्तु प्रचुर मात्रा में दहेज दिया जाता था। इसके बाद वैदिक और स्मृति काल में जब पिता का कोई बेटा नहीं होता था, तब वह पिता अपनी बेटी को ‘पुत्रिका’ नियुक्त करता था और इस प्रकार वह बेटी-बेटे के समान मानी जाती थी। यही सिद्धांत अच्छी तरह विचारित किया जा सकता है, हमारे नए विधि निर्माताओं द्वारा यह प्रयास किया जा सकता है। इस सिद्धांत के सारतत्व को इस विधेयक में प्रतिष्ठापित करने।

मैं आशा करता हूँ कृषि-सम्पत्ति को पूर्णतया छोड़ दिया गया है जैसा कि पहले ही छोड़ दिया गया है जहां तक गवर्नर के प्रान्तों के संबंध है। मैं भाग VII, अध्याय I, धारा 94_ का संदर्भ देना चाहता हूँ, जिसमें कहा गया हैः ‘यह भाग गवर्नर के प्रान्तों में कृषि-भूमि पर लागू नहीं किया जाएगा।’ भूमि को टुकड़े-टुकड़े में बांटने को लेकर पहले ही हाहाकार मचा है। अतः हमें इस बारे में धीमी गति से कार्य करना चाहिए, ताकि इसमें और अधिक क्षोभ पैदा न हो सके। वास्तव में यदि सारी भूमि का राष्ट्रीकरण हो जाए तो कोई कठिनाई न हो। अतः जब तक यह प्रश्न ज्वलंत है तथा इस बारे में अन्तिम रूप से निर्णय नहीं किया जाता है। हम कृषि-भूमि को छोड़ने का निर्णय कर सकते हैं न केवल गवर्नर के प्रांतों पर अपितु केन्द्र शासित क्षेत्रों पर भी इस भाग के लागू होने का निर्णय न करें।

अब मैं उस बड़े प्रश्न का उल्लेख करूंगा, जिसने काफी समय से मानवता को विचलित कर रखा है। मेरा अभिप्राय, विवाह और तलाक है। इस प्रश्न पर एक सिद्धांत है जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए। इस विषय पर विधान बनाकर स्वीकार किया जाना चाहिए, जो मेरे मस्तिष्क में है। ‘विवाह सरल होना चाहिए परन्तु तलाक कठिन होना चाहिए।’ मेरा विचार है कि यदि इस ठोस नियम को विवाह के लिए अपना लिया जाए, तो इससे हमारी अनेक कठिनाइयों का समाधान हो जाएगा।

सरदार भोपिन्दर सिंह मान (पूर्वी पंजाबः सिख)ः आपके मामले में तो विवाह, तलाक की अपेक्षा ज्यादा कठिन है।