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एक माननीय सदस्यः वह कौन हैं?
श्री एच.वी. कामथः यहां किसी का नाम नहीं बताया।
जनाब तजामुल हुसेनः मैं समझ नहीं पायाµक्या मेरे मित्र बहुविवाह प्रथा से सहमत हैं?
श्री एच.वी. कामथः मैं केवल यह कहूँगाख्...,
जनाब तजामुल हुसेनः सिर्फ एक विवाहिता पुरुष ही ऐसा कह सकता है।
श्री एच.वी. कामथः कभी-कभी, जब एक दम्पत्ति अधिक समय तक विवाहित रहता है, उसका हिंदू-मन अपनी पत्नी से विवाह का संबंध-विच्छेद करने का समझौता नहीं कर पाता, चाहे विवाह का उद्देश्य ही विफल क्यों न होने लगे। इसलिए प्रेम और मानवता की दृष्टि से नई संहिता में इस प्रकार की व्याख्या मेरी सोच के अनुसार की जानी चाहिए कि ऐसी स्थिति आने पर पति को अपनी पत्नी से यह अनुमति मिलनी चाहिए कि वह दूसरा विवाह कर ले और यदि पत्नी इस प्रकार की अनुमति दे देती है, तो न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। परन्तु विवाह का आदर्श जैसा कि पंडित ठाकुर दास भार्गव ने बताया है, सम्पत्ति और प्रेम की दृष्टि से एक समान होना चाहिए। मैं इससे आगे भी कहना चाहूँगा कि मस्तिष्क दो हों परन्तु विचार एक हो। दो दिल हों परन्तु धड़कन एक हो।
श्रीमती हंसा मेहता (बम्बईः सामान्य)ः किंतु बहुविवाह में तो दो हृदयों से अधिक हृदय होंगे।
श्री एच.वी. कामथः मैं बहुपति विवाह का विरोधी नहीं हूँ, यदि पति वैसा करने पर एतराज़ न करें।
श्रीमती पूर्णिया बनर्जीः बहुत उदार हैं आप!
श्री एच.वी. कामथः मैं समानता के सिद्धांत के आधार पर ऐसे विचार रखता हूँ और मैं पुरुष और महिला दोनों के लिए ही अन्तिम सीमा तक जाता हूँ। यह हमारे इतिहास की खेदजनक घटनाएं या परिवर्तन हैं कि हमारे दीर्घकालीन और प्राचीन हिंदू इतिहास में हमारी महिलाओं ने आर्य युग, वैदिक काल, उपनिषद् काल और स्मृतिकाल में जिन अधिकारों का उपयोग किया था वे सभी अधिकार उनसे छीन लिए गए तथा बाद में मध्यकाल में इन्हें अप्रभावी कर दिया गया। मुझे आशा है कि यह संहिता इस प्रकार कार्य करेगी कि जिन महिलाओं का स्वर्ग मध्यकालीन युग के अन्धकार में विलुप्त हो गया है, वह उन्हें पुनः आधुनिक युग में प्राप्त हो सकेगा।
मुझे बाहर से एक मित्र द्वारा चेतावनी मिली है, जिसमें कहा गया है कि ईश्वर के