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स्वीकार किया है, पर मैंने अभी तक इस बारे में कुछ भी नहीं कहा है। यह भी हो सकता है कि किसी समय पर मैं धाकियाकर निकाल दिया जाऊँ। अभी अनेक वक्ता आने वाले हैं और मैं समझता हूँ कि कल चार बजे इस प्रस्ताव का समापन हो जाएगा।
माननीय अध्यक्षः यह असंभव है कि श्री नजीरुद्दीन अहमद को धकियाकर निकाल दिया जाए। माननीय सदस्य को अवसर अवश्य मिलेगा। अभी श्री झुनझुनवाला।
श्री बी.पी. झुनझुनवाला (बिहारः सामान्य)ः मैं किसी अन्य समय पर बोलना चाहूँगा।
श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः वे या तो तुरंत भाषण दें या फिर दें। किंतु नियमों के अनुसार, यदि किसी सदस्य से बोलने के लिए कहा जाता है, तो उसे अवश्य बोलना चाहिए। अन्यथा वह उस विषय पर बोलने का अवसर खो देता है।
माननीय अध्यक्षः बाबू रामनारायण सिंह।
बाबू एमनारायण सिंहः मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। अध्यक्ष महोदय, आपने आज मुझे कृपापूर्वक उस अप्रिय विधेयक का विरोध करने का अवसर प्रदान किया है, जो इस सदन में विचार-विमर्श के लिए प्रस्तुत है। श्रीमान, सर्वप्रथम मैं इस सदन को बताना चाहूँगा कि मैं दकियानूसी नहीं हूँ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः आप दकियानूसी नहीं हैं। मैं जानता हूँ कि आप नहीं हैं।
ऽबाबू रामनारायण सिंहः मैं उन व्यक्तियों में से एक हूँ, जो चाहते हैं कि पुराने रिवाज़ों को बिना देर किए खत्म कर दिया जाए। परन्तु ऐसा कार्य बुद्धिमत्ता से किया जाना चाहिए। जब कोई कार्य किया जाता है तो बुद्धि की यह मांग है कि हमें जांचा-परखा जाना चाहिए कि कब क्या किया जाए और कैसे किया जाए। मैं अपने माननीय मित्र डॉ. अम्बडेकर का प्रशंसक हूँ और मैं महसूस करता हूँ कि वे देश के गौरव हैं। मेरे लिए भी वे गौरव के पात्र हैं। परन्तु मैं यह नहीं समझता कि ऐसा विद्वान व्यक्ति ऐसे व्यर्थ और विनाशक कार्य में क्यों लगा है। श्रीमान, यह सरकारी विधिकरण है। मैं नहीं जानता कि लोग कानून को क्या समझते हैं। कानून कुछ भी नहीं है, यह लोगों की इच्छा है जो कानून द्वारा व्यक्त होता है। मुझे क्षमा करें, सरकार नहीं समझती कि कानून क्या है? मैं कहता हूँ कि इस देश के अधिकांश लोग यह महसूस करते हैं कि यह विधिकरण सदन के समक्ष नहीं आना चाहिए था।
एक माननीय सदस्यः नहीं, क्यों?
ऽसीए. (विधा.) डी., खंड 2, भाग II, 28 फरवरी, 1949, पृष्ठ 950-53