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रीति से विवाह करना चाहता है तो वह उस सिविल विवाह के अनुसार विवाह करेगा जिसका आश्रय मुसलमान, ईसाई तथा प्रत्येक व्यक्ति लेता है। यह हमारी संयुक्त नागरिक संहिता है। इसलिए, मेरा मन यह है कि सिविल विवाह के प्रावधानों को इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
मैं इस विधेयक के सभी प्रावधानो का उल्लेख नहीं करना चाहता हूँ। मैंने इसलिए कहा है क्योंकि मैंने सोचा कि इस चरण में हमें अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना चाहिए और डॉ. अम्बेडकर को यह बताना चाहिए कि इस विधेयक के बारे में हम क्या महसूस करते हैं तथा देश में आम मानना क्या है। यह विधेयक बुरा नहीं है और जबकि हमने यह निर्णय ले लिया है कि हम इसे लागू करेंगे, तो हम विधेयक के अच्छे प्रावधानों को पारित कर सकते हैं। ऐसे प्रावधानों के सम्बंध में, मैं अड़चन नहीं डालना चाहता हूँ अथवा ऐसा रूख नहीं अपनाना चाहता हूँ जिससे लगे कि हम विलम्ब करने की चाल चल रहे हैं अथवा हम विधेयक पारित नहीं होने देना चाहते हैं। मैं यह बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ क्योंकि कई लोगों के मन में यह बात होगी कि जो व्यक्ति लम्बा भाषण देते हैं। वे वास्तव में इस विधेयक को पारित नहीं होने देना चाहते हैं। यह एकदम गलत है। जहाँ तक मेरा सम्बंध है, मैं चाहता हूँ कि विधेयक पारित हो तथा जो लोग इसके पक्ष में हैं मैं चाहता हूँ कि वे यह देखें कि ऐसे प्रावधानों को पारित न किया जाये जो लोगों की धारणाओं और परम्पराओं के अनुरूप न हों।
* सरदार हुकम सिंह (पंजाब) : महोदय, मेरे मित्र, पंडित ठाकुर दास भार्गव के
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दृष्टिकोण के प्रति मेरी सहानुभूति है। इनकी बातों से मैं यह समझा हूँ कि संहिता को पारित किया जाये, परन्तु वह नहीं चाहते हैं कि इसे उन पर अथवा उनके प्रांत के लोगों पर लागू किया जाये। वास्तव में मुझे यह यही कहना है। मैं चाहता हूँ कि विधेयक को पारित किया जाये परन्तु इसे मेरे ऊपर लागू नहीं होना चाहिए। काशः मैंने भी ऐसा प्रस्ताव किया होता तथा ऐसा करने से किसी विशेष समुदाय के प्रति झुकाव न बनता। परन्तु मैंने देखा कि यह संहिता कतिपय क्षेत्रों में लागू नहीं होती है। बल्कि कतिपय समुदायों पर लागू होती है। इसलिए, मैंने यह जरूरी समझा कि मैं यह संशोधन दूँ कि संहिता को सिखों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
महोदय मैं, उनमें से नहीं हूँ, जो यह चाहते हैं कि समाज स्थिर रहे, मैं विकास में विश्वास करता हूँ तथा समय के साथ चलना चाहता हूँ। मैं वादा कर सकता हूँ कि सिख समाज के प्रगतिशील वर्ग में आते हैं। परन्तु मैं इसलिए सिखों को इस विधेयक के दायरे से अलग रखना चाहता हूँ क्योंकि इसमें कतिपय प्रावधान ऐसे हैं जो हमारी सदियों पुरानी परम्पराओं और रीतियों के प्रतिकूल हैं।
* सं. वा. वि. खंड- VIII, भाग- II, फरवरी, 1951, पृष्ठ 2452-62