88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पंडित जी ने खंड-2 के उपखंड (2) के परन्तुक का उल्लेख किया, जो निम्नलिखित है :-
‘‘बशर्ते यह सिद्ध हो जाता है कि यदि यह संहिता पारित नहीं होती तो ऐसा व्यक्ति यहाँ पर विचारशील किसी भी मामले में हिंदू कानून अथवा उस कानून के एक भाग के रूप में किसी उक्त प्रथा अथवा रीति से नहीं बंधा होता। उस स्थिति में यह संहिता उन मामलों में उस उक्ति पर लागू नहीं होगी।’’
उनकी बातों से मैंने यह समझा कि शायद यह पंजाब में प्रचलित परम्पराओं और रीतियों को बचा सकता है, लेकिन मैं उनकी बात से सहमत नहीं हूँ क्योंकि उप-खंड (2) में कहा गया है :-
‘‘यह संहिता उस व्यक्ति पर भी लागू होती है जो धर्म से मुसलमान, ईसाई, पारसी अथवा यहूदी नहीं है।’’
इस उपखंड का परंतुक हिंदुओं और सिखों की परम्पराओं और रीति-रिवाजों का उल्लेख नहीं करता है। इसलिए, मेरे विचार से यह परम्परा और रीति-रिवाज को नहीं बचाएगा। मैं उनकी आशा से सहमत नहीं हूँ।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैंने कभी नहीं कहा कि यह परन्तुक हमारी परम्पराओं
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और रीतियों को बचाएगा, मेरे कहने का अर्थ यह था कि यदि सिद्ध हो जाता है कि हम पर हिंदू कानून लागू नहीं होता है : इसके शब्द हैं, ‘‘बशर्तें यह सिद्ध हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति हिंदू कानून के अंतर्गत नहीं आते’’ : पंजाबी इस परन्तुक के अंतर्गत नहीं आयेंगे। परन्तु हमारी परम्पराओं और रीतियाँ नहीं बचेंगी। यह सभी हिंदुओं पर लागू होता है। वास्तव में मेरे कहने का अर्थ यह था कि हमारी परम्पराओं को दूसरे प्रावधान से बचाया जाना चाहिए जिसमें यह उल्लेख होगा कि हम अपनी परम्पराओं और रीति-रिवाजों को अपनाने दिया जाये। परन्तु, इस परन्तुक से अनिश्चिता पैदा हो जायेगी।
सरदार हुकम सिंह : खंड-2 के उपखंड (1) में यह निश्चित रूप से कहा गया
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है कि यह संहिता हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों, सिखों तथा हिंदू धर्म मानने वाले लोगों पर लागू होगी।
इसलिए, जहाँ तक मेरा संबंध है। इसमें कोई संदिग्धता नहीं है। पंडित जी मेरी इस बात से सहमत हैं कि इससे हमारी परम्पराएं और रीति-रिवाज किसी भी स्थिति में नहीं बचेंगे।
महोदय, यदि भारत के नागरिकों के लिए एक समान संहिता बनाई जाती तो