हिंदू कोड - जारी - Page 104

89

शायद मैं खड़ा नहीं होता तथा यह आपत्ति न उठाता। यदि मुझे पंजाबी होने के नाते कुछ बलिदान करने के लिए कहा गया होता तो मैंने इस आशा में कुछ बलिदान किया होता कि हम एक संगठित राष्ट्र के रूप में विकास कर सकते हैं। कुछ वर्गों को निश्चित रूप से बलिदान करना पड़ेगा। परन्तु यहाँ यह उद्देश्य नहीं है। इस संहिता के माध्यम से कभी लोगों को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट करने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। यहाँ एक समुदाय का दूसरे समुदाय के साथ भेदभाव किया जाता है। इसलिए मैं समझता हूँ कि मेरा विरोध न्यायसंगत है।

मैं यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जहाँ तक इस विधेयक के कुछ अध्यायों का संबंध है, मैं उनसे पूर्णतः सहमत हूँ। मैं इसके केवल तीन भागों के विरुद्ध हूँ। यदि सभा के समक्ष हर भाग अलग-अलग रखे गये होते तो मैं समझता हूँ कि इसमें से अधिकांश बिना-विवाद के पारित कर दिए गये होते, परन्तु हमने उन्हें एक साथ ले लिया है और मैं उनका विरोध करता हूँ क्योंकि मैं उन्हें अपनी बात कहे बिना पारित नहीं होने दूँगा।

जिन प्रावधानों का मैं विरोध कर रहा हूँ, वे (1) विवाह तथा तलाक, (2) दत्तक ग्रहण, (3) उत्तराधिकार से संबंधित हैं। (एक माननीय सदस्य : बाकी क्या बचा है?) उसके बावजूद भी काफी बचा है। पंडित जी ने कहा कि यह उन लोगों पर लागू होता है जो पहले से ही हिंदू कानून के अंतर्गत आते हैं। यह सत्य है, परन्तु यदि हमने हिंदू कानून का पालन करने की स्वीकृति दी है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें भी इसमें जबरदस्ती लपेटा जाये, चाहे यह अपने दायरे से बाहर जाता है और अन्य धर्मों और कानूनों से कुछ बातें इसमें शामिल करता है। मुझे एक बार इसमें घसीटा गया है। मुझे उसमें जबरदस्ती नहीं लपेटा जाना चाहिए, यद्यपि यह अपने आप में स्थिर नहीं है।

महोदय, एक गलत धारणा यह है कि हिंदू संहिता विधेयक कहता है कि सिख हिंदू कानून के अंतर्गत आते हैं। पंजाब कस्टमरी लॉ की धारा-5 जिसका उल्लेख मेरे माननीय मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव ने पहले किया था : में कहा गया है कि :-

‘‘इस प्रांत में उत्तराधिकार, महिलाओं की विशेष सम्पत्ति, सगाई, विवाह, तलाक, दहेज, गोद लेना, संरक्षक, नाबालिग, जारजता, पारिवारिक संबंध, वसीयत, पैतृक, उपहार, विभाजपन, किसी धार्मिक रीति अथवा परम्परा आदि से संबंधित सभी प्रश्नों में रीति-रिवाज प्रथम निर्णायक नियम हैं।’’

अब मैं पूछता हूँ कि जब मैं परम्परागत कानून द्वारा उक्त बातों से बंधा हूँ तो वह हिंदू कानून कहाँ है जिसके अंतर्गत मैं आता हूँ? हिंदू संहिता में भरण-पोषण