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सरदार हुकम सिंह : तब तो यह माननीय मंत्री के पास जा सकती थी और हम ऐसा नहीं करना चाहते हैं। इसलिए, यह सबसे लौकिक रीति है। जहाँ तक आयु, जाति और समारोहों का संबंध है। इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। इसमें एक साधारण वचन देना होता है और शायद, इसका पालन भी किया गया था। पिछली बार भी मैंने कहा था कि कोई भी आदमी अपने से आयु में बड़े व्यक्ति को गोद ले सकता है। गोद लेने वाला व्यक्ति अपने पिता की आयु के व्यक्ति को भी गोद ले सकता है। इसमें कोई हर्ज नहीं है, वह विवाहित भी हो सकता है और उसके कई बच्चे भी हो सकते हैं। आप ऐसी परम्परा कहीं नहीं देखेंगे। महोदय, मैं यह नहीं समझ पाता हूँ कि यदि इन रीतियों और रिवाजों को समाप्त कर दिया जाये तो इन परम्पराओं और रीति-रिवाजों का क्या होगा जिन्हें हम मन से चाहते हैं तथा जिनसे हम कई सदियों से परिचित हैं।
महोदय, मैं एक अन्य अद्भूत उदाहरण देना चाहूँगा, जो मेरे कुछ माननीय मित्रों को रुचिकर लगेगा। मैं इस विषय पर माननीय मंत्री का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करना चाहता हूँ।
माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्य अपनी बात जारी रख सकते हैं।
सरदार हुकम सिंह : मैं माननीय मंत्री का ध्यान एक रुचिकर विषय की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ।
माननीय अध्यक्ष : शांति! शांति!
डॉ. अम्बेडकर : मुझसे गंधर्व विवाह शामिल करने के लिए कहा गया है। मैं उसकी ही बात कर रहा था।
सरदार हुकम सिंह : यदि हमारे मुख्य सचेतक यही चाहते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। महोदय, मैं गोद लेने के संबंध में एक रुचिकर बात कहने जा रहा था। इसके बारे में शायद देश के अन्य भागों के लोगों को पता नहीं है। मैंने ऐसे ही उदाहरण देखें हैं, जिनमें लड़कियों को गोद लिया गया है। उन्हें सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बनाया गया है। परम्पराओं में इसकी अनुमति है और उन्हें मान्यता मिली हुई है। महोदय, मेरा निवेदन यह है कि क्या इस संहिता के लागू होने से ये सभी परम्परायें और रीति-रिवाज समाप्त हो जायेंगे? इससे जो समाज बनेगा क्या वह अव्यवस्थित होगा? मेरे विचार से कानून को समाज की प्रगति दर्शानी चाहिए। इस संबंध में कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए तथा बाद में, समाज को उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कोसना नहीं चाहिए। ऐसा तुर्की में किया गया था परन्तु यह असफल रहा। मैं इस सरकार से अनुरोध करता हूँ कि वह धीरे-धीरे