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उसे फिर बढ़ावा देंगे। यदि आप उसे हिस्सा देंगे तो भूमिधारी यह महसूस करेगा कि उसके पास पहले ही अलाभप्रद जोत है, बैलों की जोड़ी है तथा एक गाय है तो वह कैसे लड़की को हिस्सा देगा। उसके लिए उन पशुओं जो खेती के लिए अति आवश्यक है, उनका बंटवारा करना सम्भव नहीं है। यह जवाब देना ठीक नहीं है कि यदि किसी पिता का दूसरा पुत्र होता तो वह क्या करता, उसे उसका हिस्सा मिलता। हम इस बात पर जोर दे रहे हैं कि वर्जित पीढि़यों की एक स्थायी सूची होनी चाहिए और हम उस सूची से बाहर विवाह में पुत्री को देना चाहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि एक अजनबी को लाया जायेगा। वह वहाँ नहीं रहेगा; वह स्वयं को वातावरण के अनुरूप नहीं ढाल सकेगा। वह जैसे ही लड़की से विवाह करेगा, वह अपने हिस्से की सम्मत्ति छोड़ देगा। प्रत्येक गांव में मतभेद है; प्रत्येक गाँंव में पार्टियां है। मित्र सम्पत्ति नहीं खरीदेंगे, परन्तु एक शत्रु को हिस्सा दिया जायेगा, इससे शत्रुता, कत्ल और दंगे पैदा होंगे।
श्री त्यागी : वह सही कह रहे हैं।
सरदार हुकम सिंह : मेरा निवेदन यह है कि इसे पंजाब पर लागू न किया जाये, अन्यथा आप वहां कुव्यवस्था और गड़बड़ी पैदा करेंगे।
श्री श्यामनंदन सहाय (बिहार) : अन्य प्रांतों का क्या दोष है? उनके लिए याचना
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क्यों नहीं करते?
माननीय अध्यक्ष : शांति! शांति! आगे बोलिए।
सरदार हुकम सिंह : मैंने सोचा कि यदि मैंने उनके लिए आवाज उठायी तो कुछ लोग मेरे अधिकार और प्रतिनिधित्व स्वरूप को चुनौती दे सकते थे। इसलिए, मैं अपने प्रांत तक ही सीमित रहता हूँ तथा वह भी विशेष रूप से अपने समुदाय तक। अन्यथा, जैसा कि मैंने प्रारम्भ में कहा, मैं चाहता था कि मैं अपने सम्पूर्ण प्रांत के बारे में कहूँ, परन्तु मुझे भय था कि कोई इस पर प्रश्न खड़ा न कर दे।
मैं कह रहा था कि उससे अव्यवस्था और उलझन पैदा हो जायेगी तथा सारा समाज अस्त-व्यस्त हो जायेगा। इस संहिता का यह उद्देश्य नहीं है। यह कोई प्रगति नहीं होगी बल्कि यह उलटी दिशा में जाने वाला कदम होगा। इसलिए, जहाँ तक हमारा संबंध है, हमें पीछे से धकेलो, हमें आगे बढ़ने दीजिए। आपको हमें अग्रणी समझना चाहिए तथा हमारा अनुसरण करना चाहिए। शायद, यही हमारे लिए, सारे देश के लिए बेहतर होगा।
मैं एक और बात कहना चाहता था।