हिंदू कोड - जारी - Page 112

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सिख धर्म अपनाएं। हमें यह शिकायत मिली है कि जब भी लाभ देने का कोई अवसर होता है तो हमें न तो शामिल किया जाता है और ना ही लाभ के लिए निकट रखा जाता है। बल्कि इससे वंचित रखा जाता है, परन्तु जब कोई लाभ नहीं दिया जाता है तथा जब इन परम्पराओं, रीतियों और रिवाजों को नष्ट करना होता है तो हमें शामिल कर दिया जाता है और जो हमारे लिए हितकारी नहीं है, हमें अपनी परम्पराओं और रीति-रिवाजों से लगाव है, हम लम्बे समय से इन्हें अपनाते आ रहे हैं। इसलिए, मैं साग्रह निवेदन करता हूँ कि इस विधेयक के दायरे से बाहर रखा जाये।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : महोदय, मैं आपकी अनुमति से मेरे माननीय मित्र के अंतिम मुद्दे पर एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। क्या यह सत्य नहीं है कि सिख स्वयं सरदार पटेल के पास आये थे और इस बात पर सहमत हुए थे कि केवल इन्हीं चार जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल किया जाये? यदि यह सत्य है कि यह समझौते के अनुसार है तो मेरे माननीय मित्र को यह शिकायत दर्ज कराने का कोई हक नहीं हैं।

सरदार हुकम सिंह : यह एक लम्बा विषय है। आदरणीय सरकार ने स्वयं ये शब्द कहे थे कि केवल चार जातियों को ही तभी मान्यता दी जा सकती है यदि वे सुरक्षा शर्तें छोड़ दें। इस बलिदान के कारण इन चार जातियों, वह भी पंजाब और ‘पेप्सू’ प्रांतों में, को मान्यता दी गई। वे अन्य प्रांतों में अनुसूचित जातियाँ नहीं हैं।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : वह समझौते के अनुसार है।

सरदार हुकम सिंह : नहीं।

माननीय अध्यक्ष : डॉ. अम्बेडकर।

श्री टी. एन. सिंह (उत्तर प्रदेश) : क्या माननीय मंत्री का भाषण भी उत्तर में

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जायेगा? अनेक माननीय सदस्य : नहीं, नहीं।

* डॉ. अम्बेडकर : महोदय, मैं सबसे पहले अपने ही संशोधन पर बोलूँगा तथा बाद में उन अन्य संशोधनों पर बोलूँगा जिन्हें इस खण्ड में जोड़ा गया है।

इस संशोधन में आप देखेंगे कि मैंने तीन विशिष्ट मुद्दे उठाए हैं। पहला मुद्दा यह है कि मैं उप-खंड (1) में सम्मिलित शब्द ‘‘धर्म को मानना’’ को हटाने का प्रस्ताव करता हूँ। इसको हटाने का कारण यह है कि यह महसूस किया गया है कि आज

* सं. वा. नि. खंड- VIII, भाग- II, 6 फरवरी, 1951, पृष्ठ 2462-73