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अलग करने का कोई उद्देश्य नहीं है जिन्होंने 1872 के विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत अपने विवाह कर लिये थे। इसी कारण विधेयक में सभी को शामिल करना पड़ा और यह उप-खंड (4) लाना पड़ा। मैंने यह देखा है कि एक प्रश्न प्रवर समिति के ध्यान में नहीं आया। यह स्वाभाविक है कि यदि उप-खंड (4) को यथावत रखा गया और इसे उन लोगों पर लागू किया गया जो 1872 के विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाहित थे, तो उत्तराधिकार के मामले में वे इस विशेष संहिता के मौजूदा प्रावधानों के अंतर्गत आयेंगे। अब उत्तराधिकार के मामले में उत्तराधिकार अधिनियम और इस विधेयक में निहित प्रावधानों से जो कोई भी परिचित हो, उसे यह शंका नहीं होगा कि जहां तक महिलाओं का संबंध है, उत्तराधिकार अधिनियम में प्रावधान, वर्तमान संहिता में निहित प्रावधानों से काफी उदार है। इसलिए यह उचित नहीं लगता है कि जिन लोगों ने एक विशेष कानून के अंतर्गत विवाह कर लिया है और इस कारण उत्तराधिकार अधिनियम में निहित उदार प्रावधानों के पात्र हैं तो ऐसे व्यक्तियों को जबरदस्ती इस संहिता के अंतर्गत लाया जाना चाहिए क्योंकि इसमें उत्तराधिकार से संबंधित प्रावधान अन्य प्रावधानों की तुलना में उदार हैं। इसीलिए, मैं उप-खंड (4) को हटाने का प्रस्ताव करता हूँ।
महोदय, अब मैं खंड 2 के आलोचकों द्वारा कही गई बातों पर विचार व्यक्त करूंगा। सभा पटल पर रखे गये संशोधनों का अध्ययन करने के बाद, मैं यह पाता हूँ कि मेरे और पंडित ठाकुर दास भार्गव में कोई भेद नहीं है। उनका संशोधन, खंड 2 में निहित प्रावधानों के लगभग समान है। पहले मैं यह स्पष्ट करूंगा कि मैंने अपने प्रारूप में कतिपय समुदायों, जिनको वह अनावश्यक समझते हैं। का उल्लेख किया है। जहाँ तक अन्य संशोधनों का प्रश्न है, कोई भी यह देख सकता है कि वास्तव में ये संशोधन तीन मुद्दे ही उठाते हैं। पहला, हिंदू संहिता की कोई आवश्यकता नहीं है। केवल सभी नागरिकों पर लागू होने वाले नागरिक संहित की जरूरत है। यह एक विचार है जिसका संकेत संशोधनों से मिलता है। दूसरा, सदन में प्रस्तुत यह संहिता जो इसकी शर्तों के अनुसार, हिंदू समुदाय तक ही सीमित होगी, गैर-हिंदुओं अर्थात् मुसलमान, पारसियों, यहूदियों और ईसाइयों आदि पर भी लागू किया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि इसे नागरिक संहिता माना जाना चाहिए। तीसरा सुझाव यह है कि इसका कार्यान्वयन स्वेच्छापूर्वक होना चाहिए। किसी विशेष नागरिक अथवा हिंदू समाज से किसी विशेष नागरिक अथवा हिंदू समाज से किसी विशेष सदस्य को यह छूट होनी चाहिए कि वह मजिस्ट्रेट के पास जाये और अपनी यह इच्छा जताए कि वह एक विशेष संहिता का पालन करना चाहेगा। इस संहिता का किसी अन्य परिस्थिति में इस देश में लागू नहीं किया जाना चाहिए। मेरे ख्याल से एक अन्य सुझाव भी है : इसके प्रस्तुतकर्ता का नाम मैं भूल गया हूँ : कि इस विधेयक को