102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दूसरा प्रश्न यह है कि संहिता को स्वेच्छा से लागू करने दिया जाना चाहिए। मैं समझता हूँ कि यह एक बहुत ही खतरनाक सुझाव है। उस सुझाव का क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि यह संसद कुछ चीजों की सिफारिश करने वाला मात्र एक निकाय है। यदि हम इस सुझाव को स्वीकार कर लेते हैं तो संसद लोगों से यही कह सकती है ‘‘ हमने यह कानून पारित किया है। हम इसे अच्छा समझते हैं। सज्जनों, अब यह आपके ऊपर निर्भर है कि इसको स्वीकार करना है अथवा नहीं।’’ ऐसी स्थिति में यदि हम इसे अंगीकार करते हैं तथा यदि हम इस सिद्धांत को स्वीकार करते हैं तो हम एक पूर्वादाहरण प्रस्तुत करेंगे तथा संसद द्वारा की जाने वाली सिफारिशों का कोई अंत नहीं होगा अर्थात् विधान बनाने का अधिकांश कार्य जनमत संग्रह के आधार पर बाहर के लोगों द्वारा पारित किये जाने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए। मैं यह कहना चाहता हूँ कि संसद एक सर्वोच्च निकाय है। जनमत प्राप्त करने के अलावा इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है कि यह लोगों की सहमति प्राप्त करे। यह अपनी इच्छा के अनुसार निर्णय ले सकती है। यह सर्वोच्च है, इसे कानून बनाने तथा कानून रद्द करने का अधिकार है। यदि प्रत्येक बार संसद को बाहर के उन अनभिज्ञ लोग जो कानून की तकनीकियों के बारे में मूल बातें भी नहीं जानते हों, का वोट मांगना पड़ेगा, तो संसद की स्थगित करना होगा; यही बेहतर होगा यदि संसद ही न रहे।
दूसरा, मैंने इस देश के विधानसभा के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं देखा है जिसमें संसद को ऐसे उपाय की सिफारिश की गई हो। यह पहली बार नहीं है कि संसद हिंदू कानून से संबंधित किसी कानून को पारित कर रही हैं। मैंने, जब से विधायी शक्ति का प्रयोग शुरू हुआ अर्थात् 1833 से, भारतीय विधानमंडल द्वारा पारित कानूनों की संगठना की है। अभी तक 29 कानून पारित किये गये हैं। जिनमें से कुछ कठोर स्वरूप के थे, परन्तु कभी भी ऐसी दलील नहीं दी गई कि उनमें से किसी कानून को जनमत संग्रह के द्वारा पारित तथा स्वीकृत किये जाने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए। (एक माननीय सदस्य : वे निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं थे।) यह तो और भी बदतर है। उनके निर्वाचित प्रतिनिधि न होते हुए भी उन्होंने कानून बनाने की शक्तियों का प्रयोग किया तथा इसे लोगों पर थोपा, अब, जबकि विधानमंडल में पहले ही अपेक्षा से अधिक प्रतिनिधि हैं, यह दलील जा रही है कि यह संसद लोगों के लिए कानून नहीं बना सकती है।
एक माननीय सदस्य : ऐसा किसी ने नहीं कहा है।
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डॉ. अम्बेडकर : कुछ माननीय सदस्यों ने ऐसा सुझाव दिया था जब उन्होंने कहा
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कि जनमत संग्रह होना चाहिए।