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अब मैं उन टिप्पणियों की चर्चा करूंगा जो खंड-2 के प्रारूप के संबंध में की गई थीं। मेरे मित्र सर्वश्री नजीरुद्दीन अहमद और पंडित ठाकुर दास भार्गव ने विशेष रूप से ये टिप्पणियां की थीं। महोदय, कल आप पीठासीन नहीं थे परन्तु.....
प्रो. रंगा (मद्रास) : परन्तु अध्यक्ष - पीठ वहाँ ही थी।
डॉ. अम्बेडकर : आसन वहीं पर था। मैं कह रहा था कि श्री नजीरुद्दीन ने अपनी बात आरोप लगाने से शुरू की। उन्होंने सदन को यह कहकर मेरे विरुद्ध
खड़ा करने की कोशिश की कि मेरे संशोधन की भाषा अनिवार्य थी : इसे प्रतिस्थापित करें’’। उन्होंने सोचा कि संशोधन रखने का सरल तरीका यह है कि ‘‘अमुक शब्दों के स्थान पर अमुक शब्द प्रतिस्थापित किये जाएं।’’ वास्तव में मैंने इस मुद्दे को गम्भीरता से नहीं लिया होता क्योंकि प्रारूप तैयार करना मेरा काम नहीं है : प्रारूप तैयार करना उस दूसरे लोक निकाय का कार्य है जिसके स्वरूप तैयार करने संबंधी निर्धारित नियम हैं और मैं यह आसानी से कह सकता था कि मैं उसके लिए जिम्मेदार नहीं हूँ। परन्तु मैंने इस बात की छानबीन की कि प्रारूप तैयार करने वाले ने भाषा का प्रयोग करते समय, जिसे उसने गलत उपयोग किया है, शिष्टता और निर्धारित मापदंडों का पालन नहीं किया। इस संबंध में तथ्य यह हैं, उदाहरणार्थ, श्री नजीरुद्दीन द्वारा सुझाये गये फार्मूला कि ‘‘अमुक शब्द को प्रतिस्थापित किया जायेगा’’, को प्रारूप तैयार करते समय प्रायः प्रयोग में लाया जाता है। ऐसा लगता है कि किसी अधिनियम का प्रारूप तैयार करने में प्रयोग की गई भाषा तथा संशोधन का प्रारूप तैयार करने में प्रयोग की जाने वाली भाषा में अंतर है। इसलिए, जब प्रारूपक संशोधनों का प्रारूप तैयार कर रहा था उसने निर्धारित फार्मूला अर्थात् किसी अधिनियम का प्रारूप तैयार करने में उपयोग किया जाने वाला फार्मूला नहीं अपनाया। दूसरा, जैसा कि सदन को ज्ञान है, राष्ट्रपति ने संविधान के अंतर्गत कतिपय आदेश जारी किये हैं : जिनका उन्हें अधिकार है। इस आदेश श्रृंखला में : जैसा कि मेरे माननीय मित्रों ने देखा होगा, यह बहुत ही मोटी पुस्तक है : वही भाषा प्रयोग की गई है जिसे प्रारूपक ने इस संशोधनों में प्रयोग किया है। वह कहता है कि, ‘‘मैंने इन संशोधनों का प्रारूप तैयार करते समय राष्ट्रपति द्वारा अपनाए गये पूर्वादाहरण का पालन किया है।’’ मैंने आगे छानबीन की कि, ‘‘राष्ट्रपति ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया?’’ इसका उत्तर यह दिया गया कि आदेश जारी थे तथा प्रिंटिग कागज और स्याही का कम खर्च करना जरूरी था। इसलिए, राष्ट्रपति के आदेशों को तैयार करने में उन्हें सहायता करने वाले प्रारूपक ने इन संशोधनों को रखने के विशेष तरीके का पालन नहीं किया। मेरे प्रारूपक ने संवैधानिक आदेशों में अपनाये गये पूर्वादाहरण का पालन करने में कोई गलती नहीं की है। इसलिए, मैं