हिंदू कोड - जारी - Page 119

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कहता हूँ कि मेरे विद्वान मित्र द्वारा मुझे अप्रिय रंग में रंगने का प्रयास असफल रहा है। मैं इस पर और आगे नहीं बोलना चाहूँगा।

मेरे मित्र को उप-खंड (घ) पर आपत्ति थी। उन्होंने कहा कि मैं हिंदू धर्म में परिवर्तन करने की आशा कर रहा हूँ। यदि मैंने सही समझा है तो उनका कहना यह था कि मैंने न तो खंड 2 अथवा विधेयक के किसी अन्य भाग में उसी परिवार में, जिस में उसने जन्म लिया है। धर्म परिवर्तन के अधिकारों का प्रावधान नहीं किया है। मैं कहना चाहता हूँ कि मेरे मित्र, श्री नजीरुद्दीन अहमद जो विधिवत रूप से स्वयं को कानून की विस्तृत जानकारी रखने वाला मानते हैं, यह भूल गये थे कि 1850 के निर्योग्यता निराकरण अधिनियम लाभ से एक बहुत ही पुराना कानून है, जिसे केवल उस व्यक्ति की निर्योग्यता दूर करने के लिए पारित किया गया था जो आत्मा की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए अपना धर्म परिवर्तन करना चाहता है। यह अधिनियम इस देश में उन धर्म प्रचारकों द्वारा आंदोलन चलाये जाने के परिणामस्वरूप पारित किया गया था जो इसलिए अपना धर्म परिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि पुराने हिंदू कानून के अंतर्गत जो व्यक्ति हिंदू धर्म की सीमा से बाहर गया तो वह पतित - जो सम्पत्ति का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता - कहलाता था। इस विशेष अधिनियम को हिंदू कानून के उसी नियम को समाप्त करने के लिए पारित किया गया था और मैंने अधिनियम के प्रावधानों को समाप्त करने के लिए कुछ भी नहीं किया है। यदि मेरे मित्र ने उस अनुसूची को देखा होता तो उन अधिनियमों से सम्बन्धित है जो इस संहिता से समाप्त किये जा रहे हैं, तो उन्हें मालूम होता कि उस अनुसूची में जाति निर्योग्यता निराकरण अधिनियम सम्मिलित नहीं किया गया है। इसलिए, यदि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति अपना धर्म बदलना चाहता है तो वह अपने पिता की पारिवारिक सम्पत्ति के उत्तराधिकार के सभी अधिकारों को प्रयोग कर सकता है। अतः नजीरुद्दीन अहमद की शिकायत बेबुनियाद है।

मेरे मित्र ने कहा कि उन्हें उप-खंड (2) पर आपत्ति है। यह उप खंड कहता हैः-

‘‘यह संहिता उस किसी व्यक्ति पर लागू होती है जो धर्म से मुसलमान, ईसाई, पारसी अथवा यहूदी नहीं है।’’

स्वाभाविक रूप से यह उपखंड (2) एक शेष खंड है जो उन लोगों के संतुलन का उल्लेख करता है जो न तो हिंदुओं जिनका विशेष उल्लेख है, अथवा पारसी अथवा यहूदियों अपना ईसाइयों अथवा मुसलमानों में शामिल है। इसमें कोई शक नहीं है कि इस देश में ऐसे कई लोग हैं जो किसी भी मान्यताप्राप्त धर्म को नहीं अपनाते हैं। इस बारे में हम क्या कर रहे हैं? इस विधेयक में निश्चित रूप से यह कहा जाना चाहिए कि यह या तो उन पर लागू नहीं होता है अथवा लागू होता है।