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सरदार हुकम सिंह : इसे आप अब बदलने जा रहे हैं। मैं क्या करूँ?
डॉ. अम्बेडकर : महोदय, मेरे मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव द्वारा उठाये गये मुद्दों के संबंध में, मैं यह कहना चाहूँगा कि मैं उनके भाषण से काफी प्रसन्न था।
श्री जे. आर. कपूर : उनकी प्रशंसा करने से वह आपके पक्ष में नहीं आ जायेंगे।
डॉ. अम्बेडकर : मैंने उन्हें कोई प्रलोभन नहीं दिया है। मैंने यह देखा है कि वह एक के बाद एक नई बात उजागर करते जा रहे हैं। वह बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि वह अपनी बात की रक्षा नहीं कर पायेंगे। उनका आखिरी मुद्दा बहुत ही छोटा है जो विवाहित पुत्री को बाहर करने से संबंधित है। मेरा यह कहना है कि यदि इस मुद्दे को स्वीकार किया जा सकेगा तो उनका विरोध पूर्णतः समाप्त हो जायेगा।
उन्होंने परम्परागत कानून के संबंध में भी अन्य प्रश्न उठाये हैं। मैं इस बात से सहमत हूँ तथा मैंने उनकी बात की बारीकी से समीक्षा की है। पंजाब कानून यह कहता है कि पर्सनल कानून से संबंधित मामलों का निर्णय परम्परागत कानून के आधार से किया जायेगा। परन्तु मैं जानता हूँ तथा मेरे विचार मेरे मित्र ठाकुरदास भार्गव भी जानते हैं कि परम्परागत कानून वास्तव में हिंदू कानून ही है। मैं नहीं समझता कि इस तर्क को कि पंजाब में परम्परागत कानून को हिंदू कानून कहा जा सकता है, अस्वीकार किया जा सकता है। इसे हिंदू कानून न कहने का कारण यह था कि मुसलमानों में भी इसी तरह का परम्परागत कानून प्रचलित था और ईस्ट इंडिया कम्पनी ‘‘हिंदू कानून’’ शब्दों का प्रयोग करने से घबरा रही थी क्योंकि उस समय यह कानून मुसलमानों में भी प्रचलित था। परन्तु ये केवल शब्दों के अंतर हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि पंजाब में हिंदू कानून लागू नहीं है - पंजाब हिंदू कानून के अंतर्गत आता है।
उनका महत्वपूर्ण मुद्दा यह था कि मैं उस प्रांत में परम्परागत कानूनों पर प्रहार कर रहा हूँ। मैंने अपने मित्र पंडित ठाकुरदास भार्गव और सरदार हुकम सिंह द्वारा दिये गये उदाहरणों को सुना और यह देखा कि ये परम्परागत कानून वास्तव में लागू नहीं थे। मैं उनके विचार कानूनों को ‘विवाद सरल बनाना’, उनके तलाक संबंधी कानूनों को ‘तलाक आसान बनाना’ तथा उनके उत्तराधिकार कानून को ‘उत्तराधिकार आसान बनाना’ कहूँगा। इसमें मूल रूप से कुछ भी नया नहीं है। इसलिए, मैं इस अवसर पर इस प्रश्न पर विचार नहीं करूंगा कि परम्परागत कानून की किस सीमा तक रक्षा की जानी चाहिए तथा पंजाब को किस सीमा तक अलग किया जाना चाहिए। परन्तु मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं इस कानून के अंतर्गत किसी प्रांत को शामिल करने में कोई छूट देने पर सहमत नहीं हो सकता हूँ। इसमें कोई शक नहीं