108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
होना चाहिए कि हिंदू संहिता सम्पूर्ण भारत में समान संहिता, या तो विधेयक इसी रूप में होगा, अथवा बिल्कुल भी नहीं होगा।
दूसरे मुद्दे के बारे में, जो परम्परागत कानून की रक्षा से संबंधित है।, मेरे विचार से इस मुद्दे को वह विधेयक के उन विभिन्न खंडों पर विचार करते समय उठा सकेंगे जिनमें वह परम्परागत कानून लागू करना चाहते हैं और यदि वह यह सिद्ध कर देते हैं कि परम्परागत कानून को हटाने से किसी प्रकार की कठिनाई होगी तो मैं सहानुभूतिपूर्वक इस पर अवश्य विचार करूंगा। मैं जितना सम्भव हो सके, हिंदू संहिता को सरल बनाना चाहता हूँ।
श्री त्यागी : जैसे कि पंजाब में विवाह।
डॉ. अम्बेडकर : सरल इस अर्थ में कि मैं किसी प्रकार का विरोध नहीं चाहता हूँ अथवा ऐसा विरोधी समूह जो हिंदू संहिता के विरुद्ध खड़ा हो।
यदि मेरे मित्र खंड 4 को पढ़ेंगे तो यह देखेंगे कि यह परम्परा को पूर्णतः समाप्त नहीं करता है। इसलिए, जब भी कोई विशेष खंड विचार के लिए रखा जाता है तो यदि मेरे माननीय मित्र यह सोचते हैं कि पंजाब में मौजूदा परम्परा को उस विशेष खंड के अंतर्गत नहीं लाया जाना चाहिए और यदि वह इसमें छूट के लिए कोई तर्क देते हैं। मैं निस्संदेह उस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करूंगा, मैं इसका अधिक विस्तृत उत्तर नहीं देना चाहता हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि यह इस विशेष खंड के दायरे से बाहर है। श्री आर. के. चौधरी : खड़े हुए।
श्री राज बहादुर : मैं जान सकता हूँ कि इन संशोधनों पर अभी कितने और सदस्यों को बोलना है।
डॉ. अम्बेडकर : मेरा सुझाव यह है कि इस खंड को आज ही निपटा दिया जाये। हमने इस पर दो दिन व्यतीत कर लिये हैं तथा इस पर आवश्यकता से अधिक बहस हो चुकी है।
श्री आर. के. चौधरी : महोदय, मैं इस विधान के मामले में अभी तक नहीं बोल पाया हूँ।
श्री श्यामनंदन सहाय : माननीय सदस्य प्रथम पंक्ति में आकर अपनी बात बोल सकते हैं।
* सं. वा. वि. खण्ड- VIII, भाग- II, 6 फरवरी, 1951 पृष्ठ 2473-83