110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अम्बेडकर के संशोधन सहित - का विरोध करता हूँ, मैं एक मात्र संशोधन का समर्थन इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यह व्यावहारिक रूप से हिंदू संहिता का विरोध करने के समान है। मैं यह स्पष्ट करूंगा कि यह किस तरह संहिता का विरोध करता है। यह में हिंदू संहिता को अमान्य करार देने की छूट देता है क्योंकि इस संशोधन के अनुसार हिंदू संहिता केवल उन्हीं लोगों पर लागू होगा जो खुलकर सामने आयेंगे और यह कहेंगे कि वे उन पर हिंदू संहिता लागू किया जाये।
श्री जे. आर. कपूर : मैं यह कहने के लिए मजबूर हूँ, ‘‘मुझे मेरे समर्थकों से बचाओ।’’
श्री आर. के. चौधरी : मैं अपने मित्र श्री कपूर को यह बता दूँ कि वह ‘काम्बली’
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को छोड़ सकता है परन्तु काम्बली उन्हें नहीं छोड़ेगा। यह हिंदू संहिता पर बहस के अंत तक, मैं उन्हीं का अनुसरण करता रहूँगा! यदि मेरे मित्र श्री कपूर का संशोधन स्वीकार कर लिया जाता है तो इसका अर्थ यह है कि हम आज की स्थिति में ही रहेंगे। यह हिंदू संहिता कमोवेश एक विशेष हिंदू विवाह संहिता ही होगी। यदि कोई हिंदू सिविल विवाह अधिनियम के अंतर्गत अपेक्षित घोषणा करता है तो वह वर्जित पीढ़ी के भीतर भी विवाह कर सकता है। इसी तरह, यदि किसी व्यक्ति से यह घोषणा करवायी जाती है कि वह हिंदू संहिता को मानता है और तभी यह संहिता उस पर लागू होगा तो मेरे विचार से दो तिहाई - दो तिहाई नहीं बल्कि शत प्रतिशत - हिंदू आगे नहीं आयेंगे तथा मेरे मित्र श्री कपूर द्वारा सुझाये गये तरीके के अनुसार घोषणा नहीं करेंगे। इसका अर्थ यह होगा कि यह संहिता एक तरफ रख दी जाएगी तथा हिंदू कानून जो आज भी लागू है, वही चलता रहेगा।
मैं पंजाब परम्परा कानून के बारे में जानने के लिए बहुत उत्सुक था। जैसा कि मेरे माननीय मित्र श्री पंडित ठाकुरदास भार्गव ने स्वीकार किया है, यह पंजाब परम्परागत कानून अधिनियम दो पत्नियाँ रखने पर प्रतिबंध नहीं लगाता है। मेरे माननीय मित्र, पंडित ठाकुरदास भार्गव यह चाहते हैं कि पंजाब को हिंदू संहिता के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए और यह संहिता पंजाब के अलावा शेष भारत में लागू हो सकती है - इसका अर्थ यह है कि यद्यपि भारत में दो पत्नियां रखना अपराध हो सकता है, परन्तु पंजाब में नहीं तथा मेरे मित्र अपनी इच्छानुसार चल सकते हैं। मैं इसे समझ नहीं पाया मैं आशा करता हूँ कि मेरे माननीय मित्र, डॉ. अम्बेडकर स्थिति को स्पष्ट कर पायेंगे। जब परम्परा पर कानून का जोर चलता है तो वह परम्परा अपरिवर्तनीय हो जाती है और उस पर वास्तव में कोई कानून हावी नहीं हो सकता है। यदि आप परम्परा सिद्ध करेंगे तो यह सिद्ध करने का भार आपके ऊपर है कि परम्परा अपरिवर्तनीय है, अनैतिक नहीं है तथा इसका पालन किया गया है। परन्तु जब इस