हिंदू कोड - जारी - Page 126

111

परम्परा को उस विधान में समाविष्ट किया जाता है जो कुछ समय के लिए लागू रहा है। तथा जब उस परम्परा को समाप्त नहीं किया गया है बल्कि उसे मान्यता दी गई है तो मैं नहीं समझ पाता हूँ कि इस संहिता के प्रावधानों को लागू करने से किस तरह हमारी परम्परा पर प्रभाव पड़ेगा। जब तक यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जाता कि इस संहिता द्वारा उस कानून को निरस्त किया गया है। मैंने शायद हिंदू संहिता का गहराई से अध्ययन नहीं किया हो, परन्तु मेरा मत यह है कि इस संहिता में पंजाब के परम्परागत कानून अधिनियम को निरस्त करने का कोई प्रावधान नहीं है। यदि उसे निरस्त नहीं किया जाता है तो इस देश में आपके पास असंगत विधान रह जायेगा। सम्पूर्ण भारत में हिंदू लोग हिंदू संहिता के अधीन होंगे, परन्तु पंजाब में रहने वाले लोग - जहाँ परम्परागत कानूनों को संहिताबद्ध किया गया है तो वे लागू हैं - इस संहिता से अप्रभावित रहेंगे। मैं इस सदन की माननीय महिला सदस्यों से पूछूँगा कि क्या वे पंजाब के हिंदुओं को एक पत्नी के जिंदा रहते दूसरा विवाह करने को अनुमति देने के लिए तैयार हैं तथा क्या वे इस बात पर सहमत है कि पंजाब में कोई तलाक नहीं होगा तथा वे पंजाब में अपनी बहनों को ‘अत्याचार’ का शिकार नहीं होने देंगे। मैं कहता हूँ कि किसी भी महिला को प्रताडि़त नहीं किया जा सकता है। प्रताडि़त करने वाले दिन चले गये हैं। आजकल महिलाओं के जुल्म से पुरुष परेशान हैं। यदि इस सदन में किसी माननीय सदस्य ने अपनी बात स्पष्टतः कहने का साहस जुटाया होता तो वह आधुनिक महिला के अत्याचार के बारे में कुछ न कुछ कहता।

इसलिए, मैं सदन से अनुरोध करता हूँ कि इस विधान को पारित करने से पहले इस गम्भीरता से विचार-विमर्श होना चाहिए। माननीय सदस्यों को याद होगा कि इस सदन के सदस्यों को दूरगामी परिणाम वाले विधान का समर्थन करने के लिए जनमत नहीं मिला है। हमारा चुनाव अप्रत्यक्ष तरीके से हुआ है। मैं अपने मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद की बात को दोहराना चाहूँगा। ऐसा नहीं है कि हम इस विधान को पारित करने में सक्षम नहीं हैं। हम किसी भी विधान को पारित करने में सक्षम हैं। हम यह विधान पारित करने के लिए सक्षम हैं कि जो नियम - एकमात्र नियम जिसे भारत सरकार ने स्वीकार किया है इसलिए प्रचलित हैं कि भारतीय विदेश सेवा में किसी भी विवाहित महिला को नहीं लिया जाना चाहिए। उसे समाप्त किया जाना चाहिए तथा इसके स्थान पर यह विधान पारित किया जा सकता है कि महिलाओं के अलावा किसी अन्य को उस सेवा में नहीं लिया जाना चाहिए। हम ऐसा करने में पूर्णतः सक्षम हैं। सक्षम न होने का कोई प्रश्न नहीं है। महिलाएं कांस्टेबल बनकर लाठी चला सकती हैं, वे पायजामा और पगड़ी पहन सकती हैं; (वे दाढ़ी भी पहन सकती हैं?) तथा वे सिपाही टुकड़ी का सदस्य भी बन सकती हैं। हम इस तरह का विधान क्यों नहीं पारित कर सकते हैं? ऐसा करने से हमारे रास्ते में कोई रुकावट नहीं आयेगी।