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श्री बी. के. पी. सिन्हा (बिहार) : महोदय, मैं कहना चाहता हूॅँ कि विधेयक के समर्थकों को अभी बोलने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ।
श्री श्यामनंदन सहाय : यह सदन की गलती नहीं है और उनकी भी नहीं जो इस संहिता के समर्थक नहीं हैं, इस विधेयक के समर्थक उठकर इसके पक्ष में अपने विचार क्यों नहीं रखते। हमें कैसे पता चलेगा कि अपने हृदय से इसका कौन समर्थन करते हैं और बाहरी तौर पर ऐसा करने के इच्छुक नहीं। श्रीमती रेणुका राय (पश्चिम बंगाल) : इस पर मत लें और देखें।
श्री राजबहादुर (राजस्थान) : अगर मैंने ठीक समझा है, तो श्रीमान् जी आप उन माननीय सदस्यों को आमंत्रित कर रहे हैं जिन्होंने संशोधन प्रस्तुत किए हैं।
माननीय अध्यक्ष महोदय : जो कोई विधेयक के समर्थन या विरोध में बोलना चाहें ऐसा करने को उनका स्वागत है।
श्री श्यामनंदन सहाय : श्रीमान् यह विधेयक कई दशकों में देश के सम्मुख प्रस्तुत है, अगर मैं कहूँ कि काफी समय से और इस विधेयक के पक्ष और विपक्ष में प्रेस और लोक मंचों से और कई अवसरों पर इस सदन में भी राय व्यक्त की गई है। मेरे मन में तनिक भी संदेह नहीं कि यदि इन विचारों की अच्छी तरह से जांच-पड़ताल की जाय तो ज्ञात होगा कि इस संहिता के प्रावधानों की सिर्फ आलोचना ही नहीं....
श्री सोनवाने (बंबई) : व्यवस्था के प्रश्न पर, श्रीमान् जी हम इस समय धारा 2 के बारे में विचार कर रहे हैं जिसका संबंध संहिता के कार्यान्वयन से है। धारा 2 के विषय में ही हमें अपनी चर्चा सीमित रखनी चाहिए। और अन्य सामान्य चर्चा से बचना चाहिए। क्या माननीय सदस्य महोदय को विधेयक पर आम बहस की अनुमति दी गई है।
श्री श्यामनंदन सहाय : क्या आपकी आशा से श्रीमान् जो मैं कह सकता हूँ....
अध्यक्ष महोदय : यहां व्यवस्था का प्रश्न नहीं उठता। मैंने कुछ मिनट पहले ही कहा था जब आप संहिता के कार्यान्वयन पर चर्चा कर रहे थे, आप कुछ जातियों को सम्मिलित करने और कुछ जातियों को निकालने के ही इच्छुक थे, यह पूर्णतः सक्षम और आवश्यक हो जाता है विभिन्न प्रावधान जातियों को फायदा या नुकसान तो नहीं पहुंचा रहे। इसीलिए मैंने कहा था कि यह कठिन हो जाता है पूरी चर्चा को, इस दशा में विशेषतया विधेयक के कुछ भागों के कारण प्रतिबंधित करें। उदाहरण के लिए, मैं यकीन करता हूँ कि कल सरदार हुकम सिंह ने विवाह और उत्तराधिकार