हिंदू संहिता : जारी - Page 138

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कि वे इस संहिता के प्रावधानों को उन पर लागू किये जाने के बारे में कैसा महसूस करते हैं। इसलिए, कुछ सदस्यों के विचार से यह सुधार जरूरी और अत्यधिक जरूरी हो सकता है। फिर भी मैं यह कहता हूँ कि इसे अनिवार्य बनाना उचित नहीं होगा। मुझे श्री जसपत राय कपूर के उस संशोधन को स्वीकार करने में बड़ी खुशी है जिसमें कहा गया है कि यह हिंदू समुदाय अथवा किसी अन्य समुदाय के सदस्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे इस संहिता को स्वीकार करें तथा इसके अधीन आने के लिए अपनी इच्छा जाहिर करें। दूसरी ओर, यदि कहा जाता है कि यह एक प्रकार का धार्मिक विधान है तो मैं समझता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर इस बात को स्वीकार करेंगे कि यह न तो उपयुक्त समय है तथा ना ही पंथ-निरपेक्ष राष्ट्र के लिए किसी तरह का धार्मिक विधान तैयार करने हेतु उचित समय है। मैं समझता हूँ कि यह सामाजिक स्वरूप का एक सुधार है। हमारे पास उपलब्ध रिकार्ड से पता चलता है कि इन सामाजिक सुधारों की स्वीकार्य स्वरूप का होना चाहिए ताकि लोग उन्हें

खुशी से अपना सकें। सभ्य समाज में भी बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन की अनुमति नहीं है तथा मुझे विश्वास है कि डॉ. अम्बेडकर इस हिंदू संहिता के माध्यम से प्रतिपादित धर्म में बलपूर्वक परिवर्तन करने का प्रयास नहीं करेंगे। 12.00 बजे मध्याह्न

जब विधि मंत्री ने कल अपना भाषण शुरू किया - वह मुझे ऐसा कहने पर माफ करेंगे - मैं समझता हूँ कि वह कुछ बेचैन लग रहे थे क्योंकि वह साधारणतया दाँयें और बाँयें प्रहार करने में कुशल नहीं हैं। उन्होंने इस सदन को हर समय उत्तम तर्कों के साथ बहुत ही बढि़या उदाहरण दिये हैं जिनमें से कुछ यहाँ तथा संविधान सभा में बहुत ही कठिन थे। परन्तु, कल उन्होंने दाँयें और बाँयें प्रहार करके तथा संशोधन देने वाले सदस्यों तथा उनके समर्थन में भाषण देने वालों को मूर्ख, बकवास आदि शब्दों से पुकारकर अपना भाषण शुरू किया....

पंडित एम. बी. भार्गव (अजमेर) : और साधारण समझ की कमी।

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श्री श्यामनंदन सहाय : हाँ, साधारण समझ की कमी। यद्यपि मैंने इसे पसंद नहीं किया तथा यद्यपि इससे मेरे दिल को चोट पहुंची, फिर भी मैं, जो वर्तमान हिंदू संहिता को पारित कराने के पक्ष में नहीं हूँ, खुशी महसूस करता हूँ कि इस विधेयक के रचयिता इतना घबराये हुए थे कि वह एक बात पर कायम नहीं थे।

श्री जे. आर. कपूर (उत्तर प्रदेश) : जब मामला कमजोर हो तो विपक्षी को अपशब्द कहो।