124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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श्री श्यामनंदन सहाय : यदि हम कानून के प्रावधानों की गम्भीरता से समीक्षा
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करते हैं तो हमें पता चलेगा कि वास्तव में कुछ बड़ी कठिनाइयां हैं जिन्हें संहिता को पारित करने मात्र से हल नहीं किया जा सकता है।
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आखिरकार, सामाजिक सुधार एक व्यक्ति ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण समाज को ध्यान में रखकर करना होता है। यदि इस संहिता के कतिपय प्रावधानों को लम्बे समय से समाज में प्रचलित तरीके को बिना ध्यान में रखे लागू किया गया तो यह वर्तमान समाज को विखंडित कर देगा। इसलिए, यह आवश्यक है कि यदि इस संहिता को पारित कर दिया जाता है तो इसे अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए ताकि वे लोग जो इसके अंतर्गत आना चाहें, स्वेच्छा से आ सकें।
हमें वह भी देखना चाहिए कि जिन लोगों ने हिंदू संहिता लागू करने का निर्णय लिया, उनकी मूल मंशा क्या थी, महोदय, मैं आपका तथा सदन का ध्यान हिंदू समाज समिति जिसे राव समिति के नाम से जाना जाता है, की महत्वपूर्ण सिफारिशों की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ। उनकी रिपोर्ट के पृष्ठ 50, पैरा 13 में कहा गया है :-
‘‘संहिता के अधिकांश प्रावधानों का स्वरूप किसी भी व्यक्ति को अनुमति देने वाला है तथा वे किसी प्रकार की अनिवार्यता नहीं थोपते हैं। इनका प्रभाव केवल यही है कि ये हिंदुओं, पुरुष और महिला, के बढ़ते हुए समुदाय को उन लोगों जो पुराने तरीकों से जीना चाहते हैं, की स्वतंत्रता को प्रभावित किये बिना स्वेच्छा से जीने का अधिकार देते हैं।’’
यह सिफारिश एकदम स्पष्ट है तथा यह सिफारिश समिति द्वारा पूरे देश का भ्रमण करने तथा हिंदू समुदाय के विचारों को जानने के बाद की गई थी। इस सिफारिश को अवश्य ही गम्भीरता से किया गया होगा, मेरा निवेदन है कि हमारे लिए उस समिति के इस महत्वपूर्ण निर्णय से हटने का कोई कारण नहीं है जिसकी सिफारिशें विचारधीन संहिता का आधार है। मैं यह नहीं जानता हूँ कि समिति द्वारा एकत्रित साक्ष्यों की गम्भीरता से समीक्षा की गई है। अथवा नहीं यदि ऐसा किया गया है तो मुझे कोई संदेह नहीं है कि भारत सरकार इस विधेयक को लागू करने के सम्बंध में वही निर्णय लेगी।
कल कुछ मित्रों ने इस विशेष मुद्दे पर जनमत संग्रह करने का सुझाव दिया था। यहाँ हम देखते हैं कि माननीय विधि मंत्री इसके पूर्णतः विरुद्ध हैं, परन्तु हद