हिंदू संहिता : जारी - Page 142

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श्री श्यामनंदन सहाय : आपको मेरे से अधिक जानकारी हो सकती है परन्तु मैं अपनी नहीं बल्कि सदन के सदस्यों की बात कर रहा हूँ। मैं यह कहने का साहस नहीं कर सकता हूँ कि मुझे आपसे अधिक जानकारी है।

एक माननीय सदस्य : लाख रुपये के बारे में क्या हुआ?

श्री श्यामनंदन सहाय : पंडित को लाख रुपये मिले।

पंडित ठाकुरदास भार्गव (पंजाब) : क्या माननीय मंत्री ने इस सदन में यह स्वीकार नहीं किया था कि जनमत इस विधेयक के पक्ष में नहीं है?

श्री श्यामनंदन सहाय : क्या उन्होंने स्वीकार किया था? मुझे बहुत खुशी है। यह बात मेरे पक्ष को और भी मजबूत बनाती है। यदि ऐसा है तो माननीय मंत्री के पास इस संहिता के साथ सदन में आने का कोई आधार नहीं है। फिर भी, कठिनाई उस समय पैदा होती है जब आप सत्ता में आते हो तथा सत्ता के अलावा उस व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से यह भावना आ जाती है कि वह अन्य लोगों से अधिक जानकारी रखता है। एक बार मिस्टर ग्लैडस्टोन की महारानी विक्टोरिया ने फटकारते हुए कहा, ‘‘प्रधान मंत्री, आपको यह मालूम होना चाहिए कि मैं महारानी हूँ, इंग्लैण्ड की प्रधान हूँ।’’ तत्पश्चात् ग्लैडस्टोन ने करारा जवाब दिया, ‘‘हाँ, महामहिम, परन्तु मैं इंग्लैण्ड के लोगों का प्रतिनिधि हूँ।’’ इसलिए, विधि मंत्री जी आप आज भारत के सत्ता में प्रधान हो सकते हो, परन्तु हम भारत के लोग हैं तथा यदि आप हमारी बात नहीं सुनते हो तो आप भी उसी स्थिति से गुजरेंगे। आप चाहें इसे माने या न माने, यही होगा।

मेरे विचार से इस हिंदू संहिता के मामले को जिस तरह से लिया जा रहा है उस तरह से नहीं लिया जाना चाहिए- ऐसा कहने के लिए मुझे माफ करना, धार्मिक सुधार और सामाजिक सुधार नितांत आवश्यक हैं। कोई भी सदस्य सदन में उठकर यह नहीं कह सकता, ‘‘नहीं, हम जहाँ थे, वहीं रहेंगे।’’ तो फिर हम आपसे क्या करने के लिए कह रहे हैं? हम केवल यही कह रहे हैं कि इस विधान को अनुज्ञात्मक बनाया जाए, लोगों को इसके बारे में जानकारी हो। उन्हें इस मामले पर विचार करने दें तथा सम्पूर्ण मामले पर विचार करने के बाद यदि वे सोचते हैं कि यह देश और समाज की भलाई के लिए है तो वे इसे स्वीकार करेंगे। परन्तु, भगवान के लिए अनिवार्य मत बनाइए।

श्री आर. वेलायुधन (त्रावणकोर-कोचीन) : तब विधान का क्या अर्थ रह जाता

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है? इसे क्यों लाया जाये?