हिंदू संहिता : जारी - Page 145

130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ज्ञान नहीं है, तब क्या यह सोचना सम्भव है कि उनमें से प्रत्येक व्यक्ति विवाह और तलाक के लिए न्यायालय जायेगा? यदि उन्हें न्यायालयों में जाना होगा तो माननीय विधिमंत्री और यह सदन मेरी इस बात से अवश्य सहमत होंगे कि यह कदम वकीलों के लिए स्वर्ग समान होगा। इतने बड़े देश में कुछ समय तक इस तरह का अनिवार्य विधान पारित करने का कोई औचित्य नहीं है। लोगों को मौका दो तथा यदि वे इसे आवश्यक समझते हैं तो उन्हें इसे स्वीकार करने दो।

हमने इस संहिता पर बहुत कुछ कहा है तथा इस संहिता में एक बड़ी और प्रगतिशील स्थिति का दावा किया गया है। जब आप कहते हैं कि हम देश की महिलाओं को यह दे रहे हैं, हम वह दे रहे हैं तो मैं समझता हूँ कि कुछ सीमा तक इनके बारे में कुछ कहने की जरूरत है। परन्तु जब हिंदुओं की सामाजिक दशाओं का अध्ययन करते हैं तो क्या हम इस बात से सहमत नहीं होंगे कि अपने घरों में ये महिलाएं बल्कि प्रत्येक महिला अपने आप में ‘अलेग्जैन्डर’ थी? आप उसके साम्राज्ञी जैसे दर्जें को हटाकर उसे एक सहभागी जैसा दर्जा देना चाहते हो। तथा आप यह जानते हैं कि संयुक्त परिवार व्यवस्था में साथी का एक निश्चित स्थान और आदर होता था। वे एक-दूसरे पर निर्भर होते थे तथा इसलिए, एक साथ दूसरे साथ का ध्यान रखता था। परन्तु संयुक्त परिवार व्यवस्था समाप्त होने के बाद आप महिलाओं को सहभागी का दर्जा देना चाहते हैं। यदि आप सहभागी हो तो आपका निर्धारित अधिकार और कोटा होता है। आज महिलाएं सम्पूर्ण परिवार की मुखिया हैं।

डॉ. अम्बेडकर : हाँ, बिल्कुल सही है।

श्री श्यामनंदन सहाय : कल आप उन्हें सहभागी बताएंगे।

एक माननीय सदस्य : किसमें सहभागी बनाएंगे? श्री श्यामनंदन सहाय : सम्पत्ति में।

एक माननीय सदस्य : जीवन में नहीं?

श्री श्यामानंदन सहाय : मेरे कहने का अर्थ है। सम्पत्ति में भागीदार। वह अपने पिता के घर से कुछ न कुछ प्राप्त करती है। वह उसकी मालकिन है। वह महसूस करती है कि उसने स्वयं कुछ हासिल किया है। आपको उसे अपने पति द्वारा खरीदे गये नये मकान पर निर्भर नहीं रहने देना चाहिए। आप जानते हैं कि सम्पत्तियाँ समस्यायें पैदा करती हैं, मैंने कई परिवार ऐसे देखें हैं जिसमें पत्नी का मुख्तारी अधिकार पति के पास नहीं बल्कि किसी अन्य व्यक्ति के पास होता है।

डॉ. अम्बेडकर : इसका भी कोई कारण हो सकता है।