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श्री श्यामानंदन सहाय : आप की संहिता हिंदू समुदाय को यहाँ तक ले जायेगा। यदि कुछ लोग ऐसा चाहते हैं तो मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है।
श्री राज बहादुर : इसीलिए तलाक की जरूरत पड़ी।
श्री श्यामानंदन सहाय : मैं जानता हूँ कि आप जैसे नौजवान तलाक कानूनों के लिए उतावले हैं, परन्तु कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें आपके कल्याण की भी चिंता करनी है।
अतः इस विधान के बारे में ये समस्यायें हैं। मैं अपने स्थान पर बैठने से पहले, इस सदन और विधि मंत्री जी से पुरजोर अनुरोध करूंगा कि वह इस विधान को आज्ञात्मक बनाने संबंधी मेरे संशोधन को स्वीकार करें। अन्यथा, हिंदू लोग इसे इतनी आसानी से नहीं लेंगे जैसा कि सरकार सोचती है। इससे देश में बहुत बड़ा हंगामा होगा। डॉ. अम्बेडकर : नहीं।
श्री हिमतसिंघका (पश्चिम बंगाल) : डॉ. अम्बेडकर को कोई भय नहीं है।
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डॉ. अम्बेडकर : मैं ऐसा नहीं समझता।
श्री श्यामानंदन सहाय : मुझे कोई शक नहीं है कि माननीय विधिमंत्री को कोई डर नहीं है। उन्हें भय होना भी नहीं चाहिए। मैंने ऐसा न कहने का प्रयास किया था, परन्तु अब मैं कह रहा हूँ, पिछली बार मैं जब अपने निर्वाचन-क्षेत्र में था तो कुछ लोगों ने मुझसे पूछा, ‘‘आप पहले काँग्रेसी नहीं थे।’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘हाँ, मैं पहले काँग्रेसी नहीं था।’’ उन्होंने कहा, ‘‘आप मुसलमानों के साथ खाना खाते हो और आप कट्टरपंथी नहीं हो तथा आप एक सच्चे हिंदू नहीं हो।’’ मैंने कहा, ‘‘हाँ, मैं उस अर्थ में बहुत ही कट्टर हिंदू नहीं हूँ।’’ और तब उन्होंने कहा, ‘‘क्या इसीलिए यह हिंदू संहिता तैयार की गई है तथा इसका प्रभाव उस गोली की तरह है जो एक ही बार में दो शिकार करती है। अथवा हिंदू समुदाय और काँग्रेस? यदि काँग्रेस सरकार इसके बाद भी जनमत के प्रति सजग नहीं होती तो उन्हें अपनी मर्जी करने दो। देश ओर लोग ही निर्णय लेंगे कि उनके साथ क्या करना है।’’
* श्री अलगेसन (मद्रास) -दुर्भाग्यवश, कल सदन का वातावरण ऐसा था कि इस विचाराधीन मामले की गम्भीरता से हम विचलित हो गये थे। मुझे खुशी है कि अब
* सं. वा. वि., खण्ड- VIII, भाग- II, 7 फरवरी, 1951, पृष्ठ 2499-2504