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उन्होंने इस संसद के सर्वोच्च और प्रधान होने पर विस्तार की चर्चा की, इस पर किसी ने प्रश्न नहीं उठाया, परन्तु इस सदन की सर्वोच्चता और महत्ता को इस सभा के प्रमुख का अपमान करके, दोहराने की जरूरत नहीं थी। यही इसका दुर्भाग्यपूर्ण भाग था। यद्यपि यह एक सर्वोच्च निकाय है, हम लोगों की इच्छा के अनुरूप चलते हैं तथा हमारी स्वीकृति, लोगों की इच्छा का प्रतीक है।
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डॉ. अम्बेडकर : आप यहाँ रहने की बजाय गाँव में क्यों नहीं रहते? वहाँ पर आप एक बेहतर मुखिया साबित हो सकते हैं।
श्री अलगेसन : मैं माननीय विधि मंत्री से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि हिंदू संहिता का विरोध करने वाले लोग सार्वजनिक नागरिक संहिता पर सहमत नहीं हो सकते हैं। उनके अनुसार यह इसलिए सम्भव नहीं है क्योंकि वह उन लोगों को भली-भांति जानते हैं। यह सभी जानते हैं कि संसद तथा विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के लिए एक वर्ष के भीतर चुनाव होंगे। यह सदन सर्वोच्च होने से यह जरूरी नहीं है कि यह प्रत्येक विषय पर विधान बनाने का काम स्वयं अपने हाथ में ले लें। यह कुछ विधानों को स्थगित कर सकता है तथा इन्हें अगली बार निर्वाचित सदन के लिए छोड़ सकता है। मुझे आशा है कि माननीय विधि मंत्री इस बात से सहमत होंगे कि आगामी सदन के पास पर्याप्त समय होगा तथा वह इस सदन की अपेक्षा लोगों के अद्यतन मत और रुख को बेहतर ढंग से प्रकट कर पायेगा। क्या इस बात को मानेंगे कि अगला सदन इस सदन की अपेक्षा इस तरह के विधान को लागू करने के लिए बेहतर स्थिति में होगा? यदि वह ऐसा नहीं करना चाहते हैं तो क्या उसका कारण यह है कि उन्हें उस सदन द्वारा इस विधेयक की पारित न किए जाने का भय है? क्या उनका इरादा ऐसा है यद्यपि मैं ऐसा नहीं कहना चाहूँगा? (एक माननीय सदस्य : आपने कह दिया है।) सो फिर वह इस देश की नई संसद के समक्ष हिंदू कानून के व्यापक संहिताबद्ध करने संबंधी विधान को प्रस्तुत किये जाने से क्यों घबरा रहे हैं? मेरे विचार से उन्हें इसका संतोषजनक उत्तर देना चाहिए।
वर्तमान सरकार के समक्ष सबसे बड़ी शिकायत यही है, हमारी क्रांति में सफल होने के बाद हम अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा मानसिक क्षेत्र में अधिक असफल हुए हैं। हम लोगों को प्रोत्साहित करने तथा लोगों की भावनाओं, जिनसे वे हमारे साथ जुड़े रहे हैं, को जोड़ने में असफल रहे हैं। इस बारे में सभी चिंतित हैं। क्यों? इस प्रश्न पर विचार करना तथा इसकी गम्भीरता से समीक्षा करना अच्छा होगा। मेरे विचार से हमने ‘कैरी ओवर’ (जारी रखने) की नीति पर अधिक ध्यान दिया है। हम पुरानी परम्परायें जारी रखते हैं तथा हमने ऐसा कोई बड़ा परिवर्तन लाने के लिए कुछ नहीं