134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किया है जिससे लोग प्रभावित हो सकें। हिंदू संहिता इस संबंध में एक उदाहरण है। इसे एकदम अलग परिस्थितियों में तैयार किया गया है और वह भी तब, जबकि हम यह सोच रहे थे कि जो भी चीज हिंदू है, वह गलत है और वह सही नहीं हो सकती है। हम सुधार और परिवर्तन चाहते थे, परन्तु गुण-दोष विवेचन के साथ नहीं। हम उसे मात्र आगे बढ़ा रहे हैं, हम हिंदू संहिता को एक ऐसी संहिता बनाने की कोशिश कर रहे है जो इस देश के सबसे बड़े समुदाय, हिंदू समुदाय पर लागू होगी तथा अन्य समुदायों पर नहीं। इसका कारण यह है कि हम कोई नयामत नहीं ला पाये हैं। हमने लोगों से भावनात्मक अपील भी की है। फिर भी हम इस क्षेत्र में पूर्णतः असफल रहे हैं। यह तो इस तरह हो गया कि नाटक में सभी मंजे हुए कलाकार हैं परन्तु वे श्रोताओं को प्रभावित नहीं कर पाते हैं। हमारा भी वही हाल है।
हमने इस संविधान को लाकर देश में क्या प्रतिक्रिया पैदा की है? यदि हमने एक सर्वमान्य विधान प्रस्तुत किया होता, तो देश के माहौल में इतना तीव्र परिवर्तन नहीं होता। इसके विपरीत, इस विधान के संबंध में यथार्थवाद का माहौल होता। हम इस विधान पर अधिक यथार्थ रूप में विचार कर पाते, परन्तु हम इसमें विफल रहे हैं। हमने ऐसा किया होता तो सम्पूर्ण देश इस बात से आश्वस्त होता कि हम पंथ-निरपेक्ष लोकतंत्र की सच्ची भावना में जाति और धर्म के आधार पर सभी मतभेदों को दूर करने के लिए लड़ रहे हैं। हमने पंथ-निरपेक्ष लोकतंत्र के अपने आदर्श को कार्यरूप दिया होता तथा सभी को आश्वस्त किया होता। इस सदन के बाहर बैनर उठाए लोगों तथा भारी पुलिस नाकेबंदी के अलावा और शायद दीर्घाओं में बहुरंगी साडि़यों में कभी-कभी बैठी भीड़ों के अलावा यहाँ कोई हलचल नहीं है। हम इससे अधिक प्रभाव दिखाने में सफल नहीं हुए हैं। परन्तु मुझे विश्वास है कि यदि मान्य विधि मंत्री एक सार्वजनिक संहिता, जो सभी समुदायों पर लागू होगी, लेकर आयेंगे तो सम्पूर्ण राष्ट्र इसमें रुचि लेगा तथा इसके बारे में अधिक यथार्थ होने की कोशिश करेगा। साथ ही, हमारे देश से बाहर भी इस पर बेहतर प्रतिक्रिया होगी। इस समय हमें बाहरी देशों में स्वार्थीं पार्टियों द्वारा यह कहकर आलोचना का शिकार बनाया जाता है कि हमारा देश जातिगत बंधन से जकड़ा हुआ है जिसके परिणामस्वरूप हमारे देश की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचती है। इस तरह की गलत धारणाएँ एक सार्वजनिक संहिता से ही दूर हो सकती हैं।
ऐसे उदाहरण भी हैं जिनमें हिंदू कानून में अन्य समुदायों को भी शामिल किया गया है। मुझे बताया गया है कि मालाबार के मोपला कच्छ मोमीन और खोजा समुदाय, आगा खाँ के अनुयायी, हिंदू कानून का पालन कर रहे थे तथा 1937 में शरियात अधिनियम पारित किये जाने के समय तक वे हिंदू कानून के अधीन ही थे। मुझे यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान के निर्माता भी हिंदू कानून के अधीन थे।