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ऐसी स्थिति में, आप ऐसा सार्वजनिक संहिता लाने से क्यों पीछे हट रहे हैं जो सभी हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों आदि पर लागू हो?
कल माननीय विधि मंत्री मेरे मित्र पंडित ठाकुरदास भार्गव के भाषण से बहुत
खुश थे। उन्होंने संहिता की पूरी प्रशंसा की। उन्होंने इस विधान को लाने के लिए माननीय विधिमंत्री का गुणगान किया। परन्तु उन्होंने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी आपत्ति की। उन्होंने यह आपत्ति की कि उसे पंजाब पर लागू न किया जाए। उन्होंने कहा कि जिन्होंने संशोधन पेश किये हैं, वे इस अधिनियम में अन्य समुदायों अर्थात् गैर-हिंदुओं को शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने पूछा कि क्या इस सदन में गैर-हिंदू इस विधान के अधीन आने को तैयार हैं? उन्होंने स्वयं इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर दिया। परन्तु, मैंने इस सदन के कुछ गैर-हिंदू सदस्यों से परामर्श किया है तथा वे इस सार्वजनिक संहिता के पक्ष में है।
श्री अलगेसन : हाँ, गैर-हिंदू।
श्री भारती : क्या मैं उन सदस्यों का नाम जान सकता हूँ?
श्री अलगेसन : माननीय सदस्य बाद में मुझसे मालूम कर सकते हैं। हम इस सदन के गैर-हिंदू सदस्यों के साथ भारी अन्याय कर रहे हैं। वे इस चर्चा में कोई रुचि नहीं ले पा रहे हैं।
डॉ. अम्बेडकर : श्री नजीरुद्दीन अहमद ने क्यों रुचि ली?
श्री अलगेसन : वह अपने मुवक्किलों का ही मन प्रकट करते हैं। इस सदन के अन्य गैर-हिंदू सदस्य यहाँ बैठकर आराम फरमाते हैं। वे चर्चा में गहरी रुचि नहीं ले पाते हैं। यदि वे इसका समर्थन करते हैं तो वे उनको यह भय होता है कि वे हिंदुओं के कट्टरपंथी वर्ग की भावनाओं को आघात पहुंचा रहे हैं और यदि वे इसका विरोध करते हैं तो इससे भी अधिक भयभीत होते हैं। इसलिए वे चुपचाप सहने वाली भूमिका निभा रहे हैं।
प्रो. रंगा (मद्रास) : वे विधेयक का समर्थन करते हैं।
श्री अलगेसन : इसमें संदेह है, इसलिए यह जरूरी है कि हम इस विधान को अधिक व्यापक बनाएं, ताकि इसमें कोई आपत्तिजनक बात न रहे। यदि हिंदू के लिए एक पत्नी रखना अच्छा है तो यह एक मुसलमान के लिए भी अच्छा होना चाहिए।
श्री श्यामनंदन सहाय : उसके लिए तो यह बेहतर होगा।