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श्री अलगेसन : मैं चाहता हूँ कि प्रोफेसर साहब की भविष्यवाणी सत्य साबित होगी तथा आप दूसरों से परामर्श करके उनमें सुधार लाने की कोशिश करेंगे। परन्तु यह धारणा अर्थात् सत्ता में बैठे लोगों की धारणा-बलवती होती जा रही है कि हम केवल हिंदू समुदाय के लिए ही आगे बढ़ने को तैयार हैं। मेरे विचार से इस विधान को पारित करने में यही एक मुख्य मनोवैज्ञानिक बाधा है। मैं आशा करता हूँ कि माननीय विधि मंत्री क्षमता से कोई ऐसा उपाय निकालेंगे जो इस गलत धारणाओं को दूर कर सके तथा इस सदन के ही नहीं अपितु बाहर के लोगों को आश्वस्त करने की कोशिश कर सकें और तत्पश्चात् अपना कार्यवाही अभियान शुरू करेंगे।
* श्री बिश्वनाथ दास (उड़ीसा) : महोदय, मैं हिंदू संहिता विधेयक पर चर्चा के दौरान मुझे बोलने का अवसर देने के लिए आपको धन्यवाद देता हूँ। मैं वास्तव में एक बैंकबेंचर (पीछे की सीट पर चुपचाप बैठे रहने वाला सदस्य) की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा था। परन्तु, माननीय विधि मंत्री के कतिपय विचारों से मुझे बोलने के लिए प्रेरित किया, अपनी आपत्ति दर्ज करने के लिए मजबूर किया है।
अपने भाषण के दौरान उन्होंने कतिपय पसंदीदा शब्द प्रयोग किये जो कि अनुचित ही नहीं बल्कि अवांछित भी हैं। उन्होंने जनमत संग्रह की मांग को अस्वीकार कर दिया। मैं जनमत संग्रह के पक्ष में नहीं हूँ। परन्तु इसे अनुपयुक्त कहना अपने आप में हास्यास्पद है। आप बहुत ही महत्वपूर्ण विषयों पर अर्थात् विवाह, तलाक, गोद लेना, संयुक्त परिवार, महिलाओं की सम्पत्ति, उत्तराधिकार जीवन-निर्वाह सहायता इत्यादि से संबंधित प्रश्नों पर विधान बनाने जा रहे है। माननीय विधि मंत्री ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि हिंदू पद्धति में समाज का कानूनी ढांचा भी शामिल नहीं है बल्कि इसमें हमारी धार्मिक धारणाएं भी निहित हैं। क्या समाज, जीवन तथा इस देश के करोड़ों लोगों के रहन-सहन से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों पर उन लोगों से परामर्श किये बिना विधान बनाना उचित होगा? अपने भाषण के दौरान उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी देश नहीं है जहाँ विधान के लिए जनमत संग्रह किया गया हो। राष्ट्रीयकरण आदि जैसे सामान्य मामलों में भी महत्वपूर्ण राजनैतिक दलों के लोकतंत्र में ऐसे जिम्मेदारी लेने से मना किया है। वे ऐसे महत्वपूर्ण मामलों पर संसद को भंग करके जनमत प्राप्त करते हैं। मैं माननीय मंत्री से पूछना चाहूँगा कि क्या इस विधेयक के सिद्धांत इंग्लैंड और अन्य स्थानों जहां संसदें भंग करके जनमत की मांग पर जनमत लिया गया है, वे विधानों में निहित सिद्धांतों से कम महत्व रखते हैं? यद्यपि मेरे कुछ माननीय मित्रों द्वारा जनमत संग्रह-अथवा संसद को भंग करना और इसी तरह का कोई कदम उठाने की मांग प्रासंगिक, तर्कसंगत और संवैधानिक है। मैं इस
* सं. वा. खंड- VIII, भाग- II, 7 फरवरी, 1951 पृष्ठ 2504-17