138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
संबंध में नहीं सोचता हूँ। अगर हम अप्रत्यक्ष रूप से चुने हुए प्रतिनिधि हैं। संसद को तब तक अपना कार्य करते रहना है जब तक सदन विधिवत रूप से गठित नहीं हो जाये। यह एक तरह से काम चलाऊ संसद की तरह है। मैं इस सदन द्वारा किसी विधान को पारित किये जाने के तकनीकी अधिकारों के संबंध में तर्क-वितर्क नहीं करना चाहता हूँ, परन्तु संवैधानिक रूप से ऐसा कहना अटपटा-सा लगता है कि ऐसे महत्वपूर्ण विधान पर जनमत लेने से मना किया जा रहा है। क्या यह इसलिए है कि वह इस तथ्य से पूर्णतः परिचित हैं कि यदि लोगों का मन लिया गया तो वे इस विधान को पारित नहीं होने देंगे? अन्यथा, यह विधान जो लम्बे समय से अनिण् ार्त पड़ा है, को और आगे स्थापित न किये जाने का आग्रह करने की आवश्यकता कहाँ है। साथ ही, इस बात पर जोर दिये जाने की क्या आवश्यकता है कि यह विधान केवल इसी सदन द्वारा पारित किया जायेगा। मैं पूछता हूँ कि इसी सदन में क्यों? इस संसद ने क्या पाप किया है? क्या यह इसलिए कि इसे अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किया गया है? मैं उनसे कहना चाहूँगा कि वह मेरी तरह एक प्रतिनिधि हैं। मैं उड़ीसा राज्य के प्रांतीय विधानमंडल द्वारा चुना गया हूँ और वह बम्बई के राज्य विधानमंडल द्वारा चुने गये हैं। मुझे माननीय मंत्री से पूछने का अधिकार है कि क्या उन्होंने अपने निर्वाचक मंडल से परामर्श किया है अथवा उन्हें इस संबंध में अपने निर्वाचक मंडल का मन प्राप्त हुआ है?
डॉ. अम्बेडकर : मैं जनमत नहीं चाहता हूँ।
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श्री बिश्वनाथ दास : क्या आप जनमत नहीं चाहते हैं? यही आपकी अपने
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निर्वाचन क्षेत्र के प्रति जिम्मेदारी है तथा यही संवैधानिक विचारधारा आप इस देश के लोगों में पैदा करना चाहते हैं? मैं अपने मित्र का ध्यान संविधान के प्राक्कथन जिसे इस सदन ने पारित किया है तथा जिसमें मेरे मित्र, माननीय विधि मंत्री ने बहुमूल्य योगदान दिया है, कि ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। संविधान का प्राक्कथन है : ‘‘....भारत के प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने तथा उसके समक्ष नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त कराने के लिए....’’ मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि क्या यह कहना है कि ‘‘मैं उन अशिक्षित लोगों जिन्होंने मुझे यहां भेजा है, जिन्होंने मुझे प्रांत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया है तथा जिन्होंने मुझे मंत्री पद ग्रहण करने का भी अवसर दिया है, से परामर्श नहीं करूंगा’’ उनकी लोकतंत्र के प्रति भावना है। महोदय, यह सब कुछ संविधान में है। हम सभी नागरिक को सामाजिक, आर्थिक तथा इनसे बढ़कर राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करते हैं। यदि मेरे मित्र यह कहते हैं कि उन्होंने देश के लोगों को राजनैतिक न्याय का आश्वासन नहीं दिया है तथा इसीलिए वह उन