140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सदस्य और सदन के बाहर उनके मित्र यह कह सकते हैं कि जिस निर्वाचक मंडल ने हमें चुना है वह प्रबुद्ध नहीं हैं, वे ‘राज्य विधानमंडलों के सदस्यों के अलावा और कोई नहीं हैं।’ मेरा कहना यह है कि सरकार और विधिमंत्री ने इस संबंध में राज्य विधानसभाओं से इस महत्वपूर्ण विधान पर अपने विचार वक्त करने, जिससे देश को अपनी बात कहने का अवसर मिलता, का अनुरोध करके उनसे परामर्श करने हेतु आवश्यक कदम उठाया होता। साथ ही, इससे इस विधान को पारित करना आसान और सुविधाजनक हो जाता। आसान इसलिए क्योंकि मतदाता द्वारा दिये गये आदेश से इस सभा में माननीय सदस्यों के लिए अपनी सीट के त्यागपत्र दिये बिना इस विधान का विरोध करना सम्भव नहीं होता; सुविधाजनक इसलिए क्योंकि कोई भी सदस्य यह कहने का साहस कर पाता कि ‘‘मैं इस विधान से सहमत नहीं हूँ, फिर भी मैं सदन का सदस्य बने रहना चाहता हूँ,’’ कोई भी दोनों तरह से नहीं कर सकता है। कोई भी सदन और सदस्य बने रहने पर जनादेश को मानने से इन्कार नहीं कर सकता है। इसलिए, मैं कहता हूँ कि विधि मंत्री और सरकार इस महत्वपूर्ण मामले में, जो कि अभी भी उनके लिए खुला है, विफल रही है। मैं माननीय विधिमंत्री की बात से सहमत हूँ कि यह विधान बहुत जरूरी है और इसे इस संसद में शीघ्र पारित किया जाना चाहिए।
आज जनमत संग्रह न करो, परन्तु राज्य विधानमंडलों के विचारार्थ इस विषय को भेजने का अभी भी समय है। हम इस विधेयक को इस बजट सत्र में पारित नहीं कर रहे हैं। इस संबंध में, मैं कहता हूँ कि इसे विधेयक को पारित करने की आवश्यकता के संबंध में सरकार की ईमानदारी पर स्वयं मुझे शंका है। अनेक माननीय सदस्य : नहीं, नहीं।
श्री बिश्वनाथ दास : मेरे माननीय मित्र जो बेचैन है, ‘‘नहीं-नहीं’’ कह सकते हैं। संसद सदस्यों के सामने अपने विचार व्यक्त करने का मुझे अधिकार है। यदि वे वास्तव में आतुर थे तो इस पर तीन दिन तक चर्चा नहीं होती। इसके पीछे क्या तात्पर्य है? मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि इस तरह के विधान, जिसके संबंध में हमारे बीच व्यापक मतभेद है तथा सारे देश में जिसका विरोध हो रहा है में माननीय मंत्री कैसे यह आशा करते हैं कि इन्हें दूर कर दिया जायेगा तथा विधेयक को कानून की पुस्तक में मेरे मित्र श्री बी. दास के कहने के अनुसार तीन दिनों के भीतर दर्ज कर दिया जायेगा। मैं झूठे सच में विश्वास नहीं करता हूँ। जब तक इस तरह के विधान पर पार्टी जनादेश के जरिये विचार न किया जाये तथा प्रत्येक व्यक्ति को इस विषय में अपनी बात कहने की अनुमति न दी जाये, तब तक यह विधान सदन की स्वीकृति के लिए प्रत्येक दिन आता रहेगा। इन परिस्थितियों में, मैं माननीय विधि मंत्री द्वारा इस सदन के बजट सत्र जिसमें हमें