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सामान्य बजट, रेल बजट के साथ-साथ लगभग 40-50 महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी विचार करना है, के तीन दिन आवंटित करने में दिखाई गई बुद्धिमता पर सन्देह करता हूँ। सरकार कहती है कि वे आर्थिक तंगी में हैं। समाचार-पत्र कहते हैं कि नये कर लगाये जाने वाले हैं। मैं नहीं जानता कि इनमें कितनी सच्चाई है। यदि इसमें थोड़ी भी सच्चाई है। मुझे सत्ता पक्ष के माननीय सदस्यों से यह पूछने का अधिकार है कि उन्होंने गत डेढ़ वर्षों से लंबित समस्या शुल्क विधेयक को पारित करने के बारे में क्या किया है। मैं कहता हूँ कि पहली चीज को पहले ही आना चाहिए। आपने अब तक कौन-सी समस्या सुलझा ली हैं? आपने किसी भी समस्या को नहीं सुलझाया है, परन्तु आपने समस्याओं को पैदा करने में सफलता पाई है। मैं समझता हूँ कि न तो सरकार और ना ही विधि मंत्री चिंतित हैं तथा ना ही वह इस विधान को पारित कराने के प्रति सचेत नहीं हैं। यदि वे चिंतित और सचेत होते तो सदन के नेता के वायदे के अनुसार एक विशेष बैठक बुलायी जाती तथा विधेयक पर विचार-विमर्श करने तथा इसे कानून बनाने के लिए एक विशेष सत्र बुलाया जाता।
महोदय, मैं क्षमा चाहता हूँ यदि मैं कहूँ कि माननीय विधि मंत्री को उस तरीके से सदन के सामने पेश नहीं आना चाहिए था जिस तरह से वह करने जा रहे हैं तथा सदन के सदस्यों के लिए व्यक्तिगत रूप से अपमानजनक शब्द कह रहे हैं। सदन के नेता ने यह घोषणा की है कि वह इस संहिता के प्रति वचनबद्ध हैं।
श्री श्यामनंदन सहाय : उसे भूल जाइए, अब ऐसी स्थिति नहीं है।
श्री बिश्वनाथ दास : मैं माननीय सदस्यों से नहीं कह रहा हूँ महोदय, मैं आपसे कह रहा हूँ। यदि माननीय सदस्य मुझे अकेले छोड़ दें तो मुझे प्रसन्नता होगी, यद्यपि मैं उनके सहयोग की सराहना करता हूँ।
इसलिए, मैं कहता हूँ कि माननीय विधि मंत्री सदन के सदस्यों के साथ निष्पक्ष नहीं रहे हैं।
अब मैं उनकी उस घोषणा पर आता हूँ जिसमें उन्होंने कहा कि जो भारत के लिए सार्वजनिक संहिता की मांग करते हैं। उनमें साधारण समझ-बूझ की कमी है। क्यों? यदि उन्होंने इसका आधार दिया होता तो मुझे खुशी होती। उनके अपमानजनक शब्द अनुचित हैं। इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने यह भी कहा कि वह दो दिनों में एक नागरिक संहिता प्रस्तुत कर सकते हैं। डॉ. अम्बेडकर : हाँं
श्री बिश्वनाथ दास : तो उन्हें अपनी मर्जी करने दो। हम पिछले कई महीनों से