144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री बिश्वनाथ दास : मैं उनसे अपील करता हूँ कि वह इस संहिता में सबसे
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अधिक विवादित विषय को हटा दें ताकि इसे आसानी से पारित किया जा सके। मैंने पहले भी कहा था तथा अब भी दोहराता हूँ कि जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं इस संहिता से सहमत नहीं हूँ और मैं अपनी मृत्यु-शय्या पर भी इसका विरोध करूंगा तथा तार्किक आधार पर हिंदू समाज गठित करने, जैसा कि इस विधेयक में प्रस्ताव किया गया है ऐसे किसी प्रयास के लिए ‘ना’ ही कहूँगा।
मेरे माननीय मित्र ने कहा कि वह इस विधान को आसान बना रहे हैं। मैं एक विद्यार्थी होने के नाते यह जानता था तथा मेरे अधिकांश माननीय मित्र भी यह जानते हैं कि पाठ्य-पुस्तकें पढ़ने के बजाए कोई सरल विधि से अध्ययन किया जाये। कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुछ प्रोफेसर पुस्तकों का ‘सरल संस्करण’ प्रकाशित कराकर काफी धन कमाते थे। मैं जानता हूँ कि इसके कारण विद्यार्थियों को कितना कष्ट उठाना पड़ता था। माननीय सदस्य कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग की रिपोर्ट में - मेरे विचार से यह सैडलर कमीशन रिपोर्ट थी - रट्टा लगाने या घोटा लगाने की पद्धति का उल्लेख है। मैं हिंदू संहिता में इस पद्धति का अनुसरण नहीं करूंगा। मैं अपने माननीय मित्र से अनुरोध करता हूँ कि वह रट्टा लगाने जैसी पद्धति के आधार पर - मेरे पास और कोई शब्द नहीं है - हिंदू समाज ही नहीं बल्कि किसी भी समाज के गठन के बारे में न सोचें।
सामान्य जीवन में वैद्यों में विद्वान और नीम-हकीम दोनों हैं। विद्वान वैद्य ‘रस’ अथवा ‘पाषाण’ कभी भी नहीं लेते हैं। वे इनसे परहेज करते हैं। परन्तु नीम-हकीम अपना बटुआ खोलता है और पारा और रसायन जैसे ‘रस’ और ‘पाषाण’ से इलाज करता है। मैं अपने माननीय मित्र से यह संखिया वाला इलाज नहीं करवाना चाहूँगा तथा मैं उनसे अनुरोध करूँगा कि वह वर्षों से एकजुट रह रहे समाज पर अपना इलाज न चलाएँ। विश्व के इतिहास पर नजर डालने से आपको मालूम होगा कि हिंदू परिषद अथवा हिंदू घर ही खुशहाल घर है। कुछ मामलों में कठिनाइयां हो सकती हैं तथा 30 करोड़ लोगों के समाज में ऐसा होना लाजिमी है। परन्तु यह सत्य है कि यहाँ वैसी खतरनाक और दर्दनाक घटनाएँ नहीं घटी जैसे कि पश्चिम के सामाजिक जीवन में घटित होती हैं। मैं यह नहीं कहता कि हमारा समाज परिवर्तन नहीं चाहता है, वह चाहता है, आप चाहे क्रांति से अथवा विकास से परिवर्तन लाओ। परन्तु इस तरह के विधान को लाने से पहले उस पर उचित विचार-विमर्श होना चाहिए।
इस संहिता के अंतर्गत जहाँ तक विवाह का संबंध है, मेरे माननीय मित्र जो बिहार से हैं तथा एक प्रख्यात न्यायविद हैं, ने कहा कि विवाह में पति और पत्नी साथी होते हैं। मैं इस मुद्दे पर उनसे सहमति प्रकट करता हूँ। यह विधेयक पति-पत्नी को