हिंदू संहिता : जारी - Page 163

148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री बिश्वनाथ दास : मुझे प्रसन्नता होगी यदि यह वास्तव में ‘नहीं’ हो परन्तु मेरा अनुभव कुछ और ही है। मेरे माननीय मित्र, विधिमंत्री ने क्या किया है? क्या बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम प्रचलन में है अथवा नहीं। मेरे माननीय मित्र ने प्रगतिशील के प्रदर्शन से क्या किया है? उन्होंने विवाह की आयु 18 वर्ष ही रखी है। 18 वर्ष ही क्यों? मैं नहीं समझ पाता कि वह 18 से क्यों आसक्त हैं। इस 18 वर्ष की आयु में किसी लड़के को वैवाहिक जीवन में बांधना और दाम्पत्य सुख देना कल्पना से बाहर की बात है। मैं इसके बारे में सोच भी नहीं सकता हूँ। मैं उनसे अपील करूँगा कि वह जन-स्वास्थ्य के अपने सलाहकारों से परामर्श लें और पूछें कि ऐसा कदम उठाना वांछनीय है। इसे 20 या 21 वर्ष तक बढ़ाइये। यदि आप वास्तव में प्रगतिवादी होने का दावा करते हो तो इस आयु-सीमा को बढ़ाइए। यदि आप इसे सीमित रखना चाहते हैं तो इसे न्यायसंगत कारणों से सीमित रखिए जो कि अधिकांश लोगों के हित में होगा। इसीलिए मैं कहता हूँ कि कुछ मामलों में यह विधेयक प्रगतिवादी नहीं है। वास्तव में, साधारण मामलों में आप देखेंगे कि लोग 18 वर्ष की आयु में विवाह नहीं करते हैं। बहुत ही कम लोग ऐसा करते हैं। इसलिए 18 और 16 वर्ष की आयु सीमाएँ, जो विधेयक में निर्धारित की गई हैं, मुझे राष्ट्रीय दृष्टिकोण से प्रगति विरोधी लगती हैं (व्यवधान)।

माननीय अध्यक्ष : मैं इस प्रश्न पर यह स्पष्ट कर दूँ कि व्यवधानों से भाषण लम्बा ही नहीं हो जाता है बल्कि वे चर्चा की प्रासंगिकता को भी समाप्त कर देते हैं। मैं भारतीय सदस्य को एक बार फिर याद दिला दूँ कि वह ऐसे प्रश्न उठा रहे हैं जिनका खंड 2 अथवा अन्य संशोधनों से कोई संबंध नहीं है। वह विवाह के प्रश्न पर इस तरह बोल रहे हैं जैसे कि विधेयक पर आम चर्चा चल रही हो। मैं किसी भी अप्रासंगिक चर्चा की अनुमति नहीं दूँगा। हम विधेयक पर खंड वार चर्चा कर रहे हैं। हमें उक्त खंड के दायरे तक ही सीमित रहना चाहिए। अन्यथा, इस विधान पर चर्चा कभी भी समाप्त नहीं हो पायेगी। मैं इसमें इच्छुक नहीं हूँ कि इसे पारित किया जाना चाहिए - इसे पारित किया भी जा सकता है और नहीं भी - परन्तु मैं यह देखना चाहता हूँ कि खंडों की चर्चा किसी भी हालत में प्रासंगिकता में रहें तथा हम खंड वार चर्चा करें। यही मैं कहना चाहता हूँ। मैं किसी भी तरीके से सम्बद्ध नहीं हूँ। इसलिए, माननीय सदस्य खंड 2 के प्रावधानों और उससे संबंधित संशोधनों तक ही सीमित रहें।

श्री बिश्वनाथ दास : महोदय, मैं आपका आभारी हूँ परन्तु मैं इस तथ्य के कारण यह कहने के लिए मजबूर था कि मेरे माननीय मित्र, विधि मंत्री ने अपने भाषण के