149
दौरान यह दावा किया कि उनका तैयार किया हुआ विधान प्रगतिवादी है। इसीलिए, मैंने कहा कि यह प्रगतिवादी नहीं है।
मैंने कहा कि यह संहिता गरीबों, ‘हेव-नॉट्स’ के लिए है और इसका मैंने स्पष्टीकरण भी दिया है। इस खंड पर मेरी आपत्ति यह है कि खंड 2 का परन्तुक अनावश्यक और अप्रचलित है। अनावश्यक इसलिए है, क्योंकि यह नई समस्यायें पैदा करता है तथा अप्रचलित इसलिए है क्योंकि यदि खंड के स्वरूप में बिना वास्तविक जरूरत के कुछ जोड़ा जाता है तो उससे और भी समस्यायें पैदा हो जाती हैं। इसलिए किसी भी विधान में इस तरह की अनावश्यकता हमेशा दूर की जाती है।
मैं यह नहीं समझ पाया कि उप-खंड (4) को क्यों रखा जा रहा है। मैं इसकी परवाह नहीं करता कि लड़की को लड़के से अधिक मिल रहा है अथवा लड़के को लड़की से। इसे पुत्री तथा पुत्र के बीच के मामले तक ही सीमित रहने दें। मैं परिवार की सम्पत्ति के विभाजन के बजाय मरुकक्कट्पम कानून स्वीकार करने से पीछे नहीं हटूँगा। यदि मेरे माननीय मित्र सारी सम्पत्ति पुत्री को देने का प्रस्ताव करते हैं तो मैं उसका विरोध नहीं करूंगा। इसे महिला को लेने दो, वास्तव में, मालाबार में, महिलाओं को लगभग सारी सम्पत्ति उत्तराधिकार में मिल जाती है। इसलिए आप ऐसा कर सकते हो अथवा आप पुत्रों और पुत्रियों को बराबर का अधिकार दे सकते हो। मैं इस मामले पर अधिक चिंतित नहीं हूँ। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मेरी कोई पुत्री नहीं है। परन्तु मैं साधारण तौर पर पुत्रियों के लिए सोचता हूँ। अब यदि आप उस हिस्से में जिसे पुत्री अपने पिता के घर से प्राप्त करती है। उप-खंड (4) के माध्यम से कुछ जोड़ते हैं तो इसका अर्थ यह है कि आप महिलाओं की वित्तीय सम्भावनाएं बढ़ाते हैं। उसे अपना ‘स्त्रीधन’ मिलता है तथा साथ ही, 1872 के विशेष विवाह अधिनियम में दी गई विशेष सुविधाएँ भी मिलती हैं। इसलिए, मेरे विवाह से अनावश्यक ही नहीं बल्कि अवांछित भी है।
मैं समझता हूँ कि वह समझ आ गया है जब भारत के सामाजिक ढाँचे में कुछ परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता है, परन्तु वह भी लोगों की सहमति तथा समाज के वर्गों की सोच के अनुसार, इसलिए, मैं आपसे तथा सत्ता पक्ष के सदस्यों से अनुरोध करता हूँ कि सरकार खंड 2 की आपत्तिजनक बातों तथा विधेयक की आपत्तिजनक बातों को भी हटा दे ताकि विधेयक को आसानी से पारित किया जा सके।
* श्री एम. ए. आयंगर : मुझे इस विधेयक पर चर्चा के दौरान भाग लेने का सौभाग्य
| v | k; | ax | j |
|---|
प्राप्त नहीं हुआ। महोदय, पिछले चरणों में आप उपस्थित नहीं थे तथा मुझे अध्यक्ष
* सं. वा. वि. खण्ड- VIII, भाग- II, 7 फरवरी, 1951, पृष्ठ 2517-31