150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पीठ पर आसीन होना पड़ा था। मैंने अपने विचारों को हमेशा अपने तक ही सीमित रखा, परन्तु अब समय आ गया है कि मैं इस मामले पर अपने विचार व्यक्त करूँ। सबसे पहले मैं सदन को तथा इस विधेयक के प्रायोजन को यह बताना चाहूँगा कि मैं प्राचीन बातों से इसलिए नहीं जुड़ा हूँ कि ये प्राचीन हैं और ना ही नई बातों का इसलिए विरोध करता हूँ क्योंकि ये नई हैं। कोई चीज पुरानी हैं तो हमें उससे चिपका भी नहीं रहना चाहिए तथा ना ही हमें किसी नई चीज की आलोचना इसलिए करनी चाहिए क्योंकि वह नई है। बुद्धिमान व्यक्ति होने के कारण यह हम पर निर्भर है कि हम इसके लाभ और हानि पर विचार करें तथा अच्छी बात को स्वीकार करके बुरी बातों को अस्वीकार करें। इसलिए मैं निष्पक्षता से कुछ ऐसे मुद्दों पर बोलना चाहूँगा जिनके बारे में अनुरोध किया गया है। मैं सीमा से बाहर नहीं जाऊँगा तथा विधेयक के द्वितीय वाचन के संबंध में ही बोलूँगा, परन्तु आम तौर पर जो भी प्रासंगिक है, मैं उस पर भी बोलूँगा।
सर्वप्रथम, मैं उन संशोधनों की चर्चा करूँगा जिन्हें सदन के समक्ष प्रस्तुत किया गया है तथा उन व्यक्तियों जिन्हें इस विधेयक के प्रयोजन के संशोधन के संबंध में उठाया है। इसको केवल अनुज्ञात्मक कानून बनाया जाना चाहिए, यह कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को यह घोषणा करने की छूट दी जानी चाहिए कि वह पंजीकरण की तिथि अथवा इस संबंध में की गई घोषणा की तिथि से इस विधेयक के प्रावधानों के अधीन होगा। माननीय विधि मंत्री ने कहा कि अंग्रेजों द्वारा इस देश में जब विधान किया गया था, तब से लेकर ऐसे विधान को पारित करने के लिए कोई पूर्वोदाहरण नहीं है जिसमें किसी व्यक्ति अथवा वर्ग की घोषणा द्वारा किसी विधान को स्वीकार या अस्वीकार करने की छूट हो। मैं समझता हूँ कि उनकी स्मृति काफी कमजोर है। इस संबंध में हम 1920 के कुची मेमन्स एक्ट को ही लें। जिन भारतीयों ने इस्लाम धर्म अपनाया, उन पर प्रायः हिंदू कानून ही लागू होता था क्योंकि वह उस कानून के अंतर्गत पैदा हुए थे। इस तरह कुची मेमन्स के संयुक्त परिवार कानून थे और वे आपस में ही एक-दूसरे को गोद ले लेते थे, परन्तु, बाद में कुछ सुधारकों ने यह अनुरोध किया कि शरीयत अर्थात् इस्लाम कानून उन सभी व्यक्तियों पर लागू होगा जो इस्लाम धर्म अपनाते हैं। इस्लाम का अपना कानून है जो उत्तराधिकार, विवाह, पैतृक संपत्ति, तलाक आदि को नियंत्रित करता है। इन इस्लामी कानूनों द्वारा नियंत्रित मदों के संबंध में हिंदू धर्म ने स्मृतिकारों द्वारा बनाए गये कानून को इसमें जोड़ दिए। इसलिए, इस्लाम को अपनाने वाले व्यक्तियों के लिए इस अधिनियम में एक अनुशास्त विधान किया गया जिससे कुची मेनन को हिन्दू कानून अपनाना चाहते थे, निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष एक अभिकथन के माध्यम से ऐसा कर सकते थे। वह या तो हिंदू कानून अथवा धर्म परिवर्तन से पहले प्रचलित परम्परागत कानून के अधीन आने को कह सकता था।