हिंदू संहिता : जारी - Page 167

152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पहले उन लोगों पर ही लागू किया जाना था जिन्होंने यह घोषणा की थी कि वे न तो हिंदू हैं, न ईसाई हैं, न जैनी हैं और ना ही पारसी हैं बाद में इसमें परिवर्तन किया है। दो ईसाई तब तक विवाह नहीं कर सकते हैं जब तक वे अपने धर्म को मानने से इन्कार नहीं करते हैं। दो मुसलमान भी तब तक विवाह नहीं कर सकते हैं जब तक वे सिविल विवाह अधिनियम के अंतर्गत अपने धर्म को मानने से इन्कार नहीं करते। परन्तु हम सदैव प्रगतिवादी हैं। हम स्वयं इन्कार करने वाले हैं। हम अपने विनाश की बात को भी मान रहे हैं। हमने यह कहकर इस अधिनियम में संशोधन किया है कि हिंदुओं को अपना धर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। विवादित हिंदू, सिविल विवाह अधिनियम को अपना सकता है। हमने ऐसा ही किया है। अब और अधिक क्या चाहिए? आज अन्य पुराने कानून का पालन करने वाले लोगों को अपनी सोच के अनुसार धर्म परिवर्तन करवाना चाहते हैं। आप मुझसे ऐसा क्यों चाहते हैं कि मैं अपना धर्म बदलूँ, मैंने पहले ही एक उदाहरण दिया है जिसमें कुची मेमनों, जिनकी संख्या बहुत कम है - के लिए एक विशेष विधान बनाया गया था। चूँकि डॉ. अम्बेडकर महसूस करते हैं कि हम लोगों में से अधिकांश पुराने - सबसे नरम शब्द है - हैं, इसलिए उन्होंने यह विधान प्रस्तुत किया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि वह 60 वर्ष की आयु में भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वह किस धर्म को मानते हैं। परन्तु वह मुझसे रातों-रात धर्म-परिवर्तन करने का निर्णय लेने के लिए कह रहे हैं, यदि मैं जोर से कहता हूँ तो मुझे गलत न समझा जाये। मैं समाज में उतना ही योग्य हूँ जितना की अन्य सदस्य दावा कर सकते हैं। मुझे अपने धर्म से कोई शर्म नहीं है। मैं इस देश के पुरुषों और महिलाओं से ही नहीं कह रहा हूँ बल्कि विश्व के लोगों से भी कह रहा हूँ कि हमें उन सिद्धांतों पर गर्व है। जिनके अधीन हम आते हैं तो उन कानूनों पर भी गर्व है जिन्हें हमारे पूर्वजों ने दिया है यदि विश्व के अन्य देशों ने ही हमारा धर्म अपनाया होता, उनमें निर्धारित सिद्धांतों का पालन किया होता तो बार-बार युद्ध नहीं होते तथा चारों ओर शांति ही शांति होती। हम सदैव उन्हीं चीजों को अपनाने के आदि हैं जिनकी पश्चिमी देशों में जरूरत नहीं होती। जो कार यूरोप में बेकार घोषित कर दी जाती है वह यहाँ एक मॉडल कार बन जाती है। साथ ही, जो परम्परा पश्चिम में समाप्त हो जाती है, वह हमारे देश में एक मॉडल बन जाती है।

1937 में हमने यह कानून पारित किया कि इस्लाम धर्म अपनाने के मामले में गोद लेने आदि के संबंध में उनका परम्परागत कानून हिंदू पद्धति के अनुसार लागू होगा। इसी प्रकार, दक्षिण में मालाबार के मोपलाहों ने मुसलमान होने के बावजूद कतिपय हिंदू परम्पराओं को अपनाया था। यह गोद लेने का प्रश्न भी नहीं है - वे ऐसी परम्पराओं में पैदा हुए हैं। इसलिए, उन्होंने उत्तराधिकार और पैतृक संपत्ति के मामले में एक नियम अपनाया तथा धर्म के मामले में दूसरा नियम अपनाया, हमने