हिंदू संहिता : जारी - Page 171

156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

निर्णय करना पड़े कि हम अमेरिका का साथ दें अथवा चीन को एक आक्रमणकारी घोषित न करें। कुछ लोगों को कहीं न कहीं असुविधा महसूस हुई होगी। महोदय, मैं आपके माध्यम से सदन से यह कहना चाहता हूँ कि वे सुविधा के संतुलन की ओर देखें। कोई भी मानवीय रीति-रिवाज त्रुटि रहित नहीं है।

विवाह के संबंध में यह एक प्रमाणिक सत्य है कि शारदा अधिनियम के लागू होने से पहले हमारी अधिकांश महिलाएँ - 99 प्रतिशत - विवाहित थीं। क्या आप यह कहना चाहते हैं कि महिलाओं को अविवाहित ही रहने दो। पुरुषों को अविवाहित रहने दो, ऐसे बच्चे होने चाहिए जिनके माता-पिता न हों। जैसा कि युद्ध में अनाथ हुए 40 हजार बच्चों की देखभाल दूसरों ने की? क्या हमारे देश में ऐसा करना उचित है? आप एक नई समस्या पैदा कर रहे हो। क्या यह सही हैं? अभी तक, या तो पुरुष को महिला की बात को मानना पड़ा अथवा महिला को अपनी आवाज नीची रखनी पड़ी। अन्यथा, घर और परिवार कहाँ रह जाता है? इसीलिए, महिला कानून के अंतर्गत नहीं है। आधुनिक महिला जो विदेशी व्यवस्था में शिक्षित हुई है तथा जिसने अपने धर्म से नाता तोड़ लिया है, यह चाहती है कि उसे अपने पिता की सम्पत्ति में अधिकार मिलना चाहिए, न कि अपने पति की सम्पत्ति में। वह भला-बुरा नहीं जानती है। वह अपनी जेब में पैसा चाहती है तथा यह महसूस करना चाहती है कि ‘‘मैं पुरुष के अधीन क्यों रहूँ?’’ मैं प्रत्येक परिवार की समस्यायें जानता हूँ, परन्तु यदि मैं ये सब बातें कह रहा हूँ तो मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। आजकल लड़कियाँ विवाह करने से मना इसलिए करती है, क्योंकि वे महसूस करती हैं कि ‘‘मैं पुरुष के अधीन क्यों रहूँ? मुझे सम्पत्ति में हिस्सा दो।’’ क्या मेरी पुत्री आशा करती है कि मैं हमेशा जिंदा रहूँ? धन से ही खुशहाली नहीं होती है। हम यह मान लेते हैं कि एक धनी पुरुष है तथा उसकी पुत्री उसकी सम्पत्ति की उत्तराधिकारी बनती है। जब उसका विवाह हो जाता है तो क्या यह सम्पत्ति उसे दूसरे पुरुष द्वारा पीटे जाने अथवा दुर्व्यवहार किये जाने से रोक सकती है? उसे ऐसा करने से क्या रोकता है? कई लोग इस संहिता का समर्थन करते हैं। मैं संसद सदस्यों की आलोचना नहीं कर रहा हूँ - वे सब कुछ जानते हैं। मैं वही सुझाव दे रहा हूँ जो कई लोग बाहर कह रहे हैं। आज हिंदू कानून के अंतर्गत लड़की एकदम वर्जित नहीं है। यदि कोई पुरुष बिना संतान मर जाता है तो विधवा को सारी सम्पत्ति अधिकार में मिल जाती है। देशमुख के अधिनियम के अलावा, वह पुराने हिंदू कानून के अंतर्गत उन मामलों में पति की संपूर्ण सम्पत्ति की उत्तराधिकारी है जिसमें उसके बच्चे नहीं होते हैं। दूसरा, यदि परिवार में पुत्री है तथा माँ की पिता से पहले मृत्यु हो जाती है तथा परिवार में कोई अन्य बच्चा नहीं है तो वह सम्पूर्ण सम्पत्ति की वारिस बन जाती है। इसमें कोई भी कठिनाई नहीं है। यहाँ पर यह माँग की गई है कि पुत्र के साथ-साथ पुत्री को