हिंदू संहिता : जारी - Page 172

157

भी हिस्सा मिलना चाहिए। परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी पुत्र की है। हम अरबपति नहीं हैं। जमींदारी प्रथा भी समाप्त हो गई है। राजा भी समाप्त हो गये हैं। अब केवल मध्यवर्ग के लोग रह गये हैं। मैं केवल उन्हीं की बात कह रहा हूँ। ऐसे गरीब लोग भी है जिनमें पति-पत्नी दोनों कुली की तरह काम करके जीवन-निर्वाह करते हैं। बहुसंख्यक मध्यम वर्ग के लोगों के साथ क्या होता है? पति एक लिपिक के रूप में कार्य करके 100 या 200 रुपये प्रति माह कमाता है। वह अपने पुत्र को पढ़ाता है तथा यह आशा करता है कि जब उसका पुत्र 21 अथवा 25 वर्ष का हो जायेगा, वह उस समय परिवार का कार्यभार संभाल लेगा जब वह स्वयं 50 अथवा 55 वर्ष का होगा। जब वह सेवानिवृत्त होता है, उसे कई बच्चों की देखभाल करनी पड़ती है। उसके पास संचित सम्पत्ति बहुत कम होती है। मैं जानता हूँ कि देश के हमारे भाग में केवल 5 या 10 प्रतिशत लोगों के पास ही 5 करोड़ से अधिक की सम्पत्ति है। हमारे देश में भूमि की सम्पदा हैं बम्बई तथा अहमदाबाद में कुछ उद्योगपति हो सकते हैं। परन्तु, साधारणतया लोगों के पास न तो उद्योग है और ना ही भूमि। मध्यम वर्ग के व्यक्ति के लिए लिपिक बनना तथा कुछ धन कमाना ही एकमात्र उद्योग है, तथा वह परिश्रम से वह धन कमाता है। उस लड़के पर घर की जिम्मेदारियों का बोझ लाद दिया जाता है। उसे पैतृक सम्पत्ति में से थोड़ी भूमि और घास-फूस से आच्छादित घर मिल सकता है। समाज उससे यह अपेक्षा करता है कि वह अपने छोटे भाईयों और बहनों का उत्तरादायित्व संभाले तथा वृद्ध माता-पिता की देखभाल करें। जब हम अंग्रेजों के अधीन थे तो रेलवे विभाग के अधिकारियों, स्टेशन मास्टरों आदि को वर्ष में एक बार सैर करने के लिए पास मिलते थे। वह पास पूरे परिवार के लिए मिलता था। मुझे खेद है कि परिवार के विवरण के सम्बंध में वही प्रक्रिया चली आ रही है अर्थात् स्वयं, उसकी पत्नी और बच्चे, वृद्ध माता-पिता के बारे में क्या होगा? यह पश्चिमी व्यवस्था के अनुरूप हो सकता है जिसमें पुत्र के विवाह के बाद वह अपना अलग परिवार बसा लेता है। इसी तरह पुत्री भी विवाह के बाद अलग चली जाती है। वृद्ध लोग एक-दूसरे का मुंह देखते रह जाते हैं। क्या हम इस देश में उस तरह का जानवरों जैसा जीवन चाहते हैं? शेष लोगों से मेरा कोई झगड़ा नहीं है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि व्यक्तिवाद अपने चरम पर है, पति और पत्नी एक ही इकाई हैं तथा उन्हें वृद्ध लोगों की रक्षा करनी चाहिए। हमारे पूर्वजों ने कई वर्षों पहले संयुक्त परिवार पद्धति शुरू की थी तथा वही वास्तविक इकाई है, जिसमें पिता, माता, पुत्र और पोते साथ मिलकर रहते हैं। मैं कहता हूँ कि वह एक खुशहाल परिवार था जिसमें कोई भी बेरोजगार नहीं होता था। जो समाजवाद और साम्यवाद की बात करते हैं, थोड़ी सहानुभूति दर्शाते हैं और मैं कहता हूँ कि यही प्रवृत्ति ही समाजवाद का मूल तत्व है। एक विशेष परिवार में पति एक और अपने बच्चों के भरण-पोषण के लिए कार्य करता है तथा दूसरी ओर, अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल भी करता है।