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से देख रहे हैं। मैं यह कहता हूँ कि इस विधान के माध्यम से समाज हर तरह से छिन्न-भिन्न हो जाता है। आपका कहना है कि एक आदमी को यह कहने दो, ‘‘मैं हिंदू धर्म को नहीं मानता’’, ‘‘हिंदू धर्म को मानने वाला’’ शब्द ही अनुचित है। आप स्वयं को हिंदू क्यों कहते हो? हिंदू धर्म में क्या रखा है? उसमें कई बातें हैं; ‘कर्म’ का सिद्धांत जिसे बौद्धों और जैनियों ने भी माना था, इनमें से एक है। मेरे लिए वेद कोई विशेष नहीं है। मैं वेदों को ईश्वरीय ज्ञान के दस्तावेज के रूप में अति पौराणि् ाक मानता हूँ। क्या मुसलमान वेदों में विश्वास नहीं करते हैं? सिख, जो सुधारवादी धर्म को मानते हैं, भी एक पुस्तक की पूजा करते हैं। मैं अपने वेदों पर तथा स्वयं को हिंदू कहने पर क्यों लज्जा महसूस करूँ? चाहें मैं ब्रह्म समाजी अथवा आर्य समाजी अथवा वैष्णव हूँ, यदि मैं वेदों में विश्वास नहीं करता हूँ तो मैं हिंदू नहीं हूँ।
दुर्भाग्य से इस देश में राजनीति में भी धर्म का समावेश हो गया है। यह कहा गया है कि जातियों और पंथों के उतार-चढ़ाव के कारण कई मुसलमानों ने धर्म परिवर्तन किया। मैं कहता हूँ कि क्या चीन में एक ही धर्म ‘बौद्ध’ नहीं था; क्या इन्डोनेशिया में भी यही एक धर्म नहीं था? लेकिन आज इंडोनेशिया और मलाया में बौद्ध धर्म कहाँ है? क्या चीन में कई लोगों ने इस्लाम धर्म नहीं अपनाया? जब भी कोई कठिनाई होती है, आप बार-बार हिंदू धर्म पर प्रहार करते हैं तथा यह कहते हैं कि यही पुरानी व्यवस्था इन सब बातों के लिए जिम्मेदार है। मैं कहता हूँ कि इसका उपाय कहीं और है। इसमें खामियों के बावजूद, हिंदू विवाह पद्धति में ही तलाक की अनुमति नहीं है। साथ ही पुत्रियों में सम्पत्ति का बंटवारा करके इसे समाप्त करने की भी अनुमति नहीं है क्योंकि पुत्रियों पर परिवार आदि चलाने की जिम्मेदारी नहीं है। यही लोगों की ताकत का स्रोत रहा है। मैं एक साधारण प्रश्न पूछूँगा, यदि पुत्री का विवाह हो जाता है, क्या आप मुझसे मेरे पुत्र अथवा मेरे दामाद के साथ रहने के लिए कहेंगे? यह कहा गया है कि ‘‘जामाता दशमो ग्रहाह’’ अर्थात् दामाद दसवां ग्रह है। मुझे वृद्धावस्था में किसी न किसी का सहारा चाहिए। दामाद के बजाए पुत्र के साथ क्यों न रहा जाये? यदि आप पुत्री को हिस्सा देते हैं तो क्या होता है? निस्संदेह, वह कहेगी, ‘‘आओ मेरे साथ रहो।’’ परन्तु मेरी स्थिति किंग लीयर की तरह होगी। मैं सभी माताओं और बहनों से अपील कर रहा हूँ कि वे इस स्थिति पर गम्भीरता से विचार करें। उन्हें अपने मन में यह भावना नहीं लानी चाहिए कि मैंने घर पर अपने सहयोगी से परामर्श नहीं किया। हमने काफी लम्बे समय तक चर्चा कर ली है।
इन परिस्थितियों में, मैं कहता हूँ कि हमें धीरे-धीरे कदम रखना चाहिए, जो भी उदार विचारधारा अपनाना चाहे उसे अपने तरीके से जीवन जीने दो, प्रसंगवश, मैं कह सकता हूँ कि ‘सती’ नैतिकता के विरुद्ध है; इसे सही ढंग से समाप्त कर दिया