162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गया। आप कहते हैं कि यह अनुज्ञात्मक प्रावधान है। आप यह क्यों नहीं कहते कि भाई अपनी बहन से विवाह कर सकता है? वह भी एक मुसलमान प्रावधान होगा। हम कुछ सीमा तक जा सकते हैं। परन्तु हमें सीमा से बाहर नहीं जाना चाहिए। हमें सगे भाई-बहन के बीच विवाह की अनुमति नहीं देनी चाहिए। प्रश्न यह है कि विवाह तीन पीढि़यों अथवा सात पीढि़यों से बाहर होना चाहिए। मैंने वंश विज्ञान संबंधी पुस्तकें पढ़ी हैं। नई बातों की खोज की जा रही हैं। वे कहते हैं कि तीन तरह के वंश है तथा एक वंश दूसरे वंश से मेल नहीं खाता है। मैंने पुराने दर्शन में ज्योतिष विज्ञान पढ़ा है। वे कहते हैं कि विवाह से पहले आपको रज्जु, सर्प और गण मतैक्य से अवश्य परामर्श करना चाहिए। ऐसा लगता है कि यह गण पश्चिमवासियों ने खोजा है। स्वर्गीय डॉ. रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान कवि थे, परन्तु हमने उन्हें महान कवि तभी माना जब पश्चिमवासियों ने उन्हें मान्यता दे दी थी। इसी तरह, हम चाहते हैं कि कोई पश्चिम से आये तथा यह कहे कि विवाह एक विशेष नियम से होने चाहिए और पुरानी स्मृतियों में जो बातें हैं, वे बहुत अच्छी हैं। मैं इस अर्थ में रूढि़वादी हूँ कि मैं आगे नहीं बढ़ना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि दूसरा आधार स्थिर और मजबूत है, मैं सदन से अनुरोध करूँगा कि उस बात पर टिके रहें जो उन्हें इतने लम्बे समय से अच्छी लगती रही है।
अपनी बात समाप्त करने से पहले, मैं मरूमक्कट्टयम कानून के एक और पहलू का उल्लेख करना चाहूँगा। वे सभी बुद्धिमान हैं; विशेषरूप से सचिवालय में प्रत्येक सचिव मालाबार का मेनन है। मुझे उन पर गर्व है। उनकी एक अलग जीवन शैली है, उनसे पूछिए कि क्या वे अधिक खुश हैं? आप उन पर यह कानून लागू क्यों नहीं करते? अलियासंतन कानून को ही ले लीजिए। आप सोचेंगे कि प्रकृति के विरुद्ध है जिसमें पति, पत्नी के घर जाता है और उसी के घर में रहता है। वहाँ बच्चों का भरण-पोषण माँ और उसके भाई द्वारा किया जाता है न कि स्वयं पति द्वारा। यह बात आप को अजीब लग सकती है। उसमें प्राकृतिक स्नेह अलग है। क्या मैं अपने बच्चों से अधिक अपनी बहन के बच्चों को स्नेह से गले लगाऊँगा? यह उनका नियम है तथा हम उन्हें इसी कानून के अंतर्गत रहने की अनुमति दे रहे हैं। परन्तु जब मेरे माननीय मित्र पंडित ठाकुरदास भार्गव कहते हैं कि पंजाब में कतिपय परम्परायें ऐसी हैं, आप कहते हो कि उन्हें एकदम बदल दिया जाना चाहिए क्योंकि मेरे मित्र उतने मुखर नहीं हैं। आखिरकार, यह विधि-शास्त्र का गलत सिद्धांत है। कानून, रीति-रिवाज से पहले नहीं बनता। यह एक मानवीय परम्परा है। यह तो ऐसा कहना हुआ कि व्याकरण, भाषा से पहले नहीं बनी थी। एक बच्चा पहले बोलना सीखता है तथा बाद में व्याकरण का प्रश्न आता है। यह कहना विधिशास्त्र के सिद्धांत के विरुद्ध है कि रीति-रिवाज गलत हैं।