हिंदू संहिता : जारी - Page 179

164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

स्त्रियों में सीता सावित्री हुई हैं। उन्होंने अपने पतियों का अनुसरण किया। शायद अब हमें अपनी पत्नियों का अनुसरण करना पड़े। उन्हें पुराण लिखने दें और यदि इससे घरेलू शांति कायम होती है तो यह भी कहें कि पुरुष को अपनी पत्नियों का अनुसरण करना चाहिए। आज हम पति और पत्नी हैं। कल में एक चलचित्र देखने जाता हूँ और एक खूबसूरत स्त्री देखता हूँ। क्या सिर्फ इसलिए कि मेरी पत्नी उतनी

खूबसूरत नहीं है जितनी कि चलचित्र वाली महिला, मैं घर में वापस आकर अपनी पत्नी की पिटाई करता हूँ? और अगले दिन मैं तलाक के लिए आवेदन कर दूँ? कोई महिला शक्तिहीन नहीं है। संभवतः वे मेरे ऐसे कहने पर मुझसे झगड़ा कर सकती है। लेकिन आप तब तक उन संस्थाओं से छुटकारा नहीं पा सकते हैं जब तक कि आप ईश्वर से यह प्रार्थना न करें कि इस संसार में या तो सिर्फ स्त्रियाँ ही हों या सिर्फ पुरुष। ये संस्थाएँ अत्यन्त ही आवश्यक हैं। घरेलू जीवन को समुचित रूप से संतुलित करने के लिए ये संस्थाएँ आवश्यक है। ये आर्थिक हित के लिए पारस्परिक निर्भरता के लिए और बेरोजगारी से बचने के लिए तथा अनेक अन्य हितों के साधन के लिए यह आवश्यक हैं। यदि पति की मृत्यु हो जाती है तो विधवा की देखरेख के लिए देवर या जेठ होता है। विधवा को अपने पाँव पर खड़ा होने के लिए तत्काल सहायता देने के लिए हमारे यहाँ कम से कम भरण-पोषण कानून है। मैं सिर्फ उन स्त्रियों का विरोध कर रहा हूँ जो अपने पिता की संपत्ति में से अपना हिस्सा अलग ले लेती हैं तथा अपने पति को अकेला छोड़ देती हैं। ईश्वर उनसे और अविवाहित स्त्रियों की फौज से हमारी रक्षा करें।

श्री टी. एन. सिंह (उत्तर प्रदेश) : महोदय, मेरे नाम से एक संशोधन प्रस्तावित

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है।

माननीय अध्यक्ष : उन सभी को जिन्होंने संशोधन प्रस्तुत किए हैं तथा दूसरों को भी बोलने का मौका दिया जाएगा।

* श्री राजबहादुर : मैंने माननीय सदस्यों, जिन्होंने मुझसे पहले भाषण दिया है को पूरे मनोयोग संगत से सुना है हालाँकि मैंने कतिपय प्रश्न उनसे और अधिक स्पष्टता के लिए पूछे। (मैं स्वयं को इस विधेयक के प्रावधानों से पूरी तरह सहमत पाता हूँ।) और मेरा ससमर्थन अनुचित उत्साह या यौवन के उतावलेपन पर आधारित नहीं है बल्कि ऐसा इसलिए है कि मैं यह समझता हूँ कि हमारे देश के द्वारा स्वतंत्रता की प्राप्ति से उद्भूत परिस्थितियों और मौके की अनिवार्यता को देखते हुए यह उपाय आवश्यक है। मेरा मानना है कि जब तक हम इस तरह के उपाय नहीं करते और समय के साथ संघर्ष को रोकते हैं तो हमारा पतन अनिवार्य है।

* संसदीय वाद-विवाद, खंड VIII, भाग II, 7 फरवरी, 1951, पृष्ठ 2532-36