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यह सर्वविदित है कि संभवतः पिछले तीन वर्षों के दौरान किसी भी दूसरे विधेयक या विधायी कार्य ने इतने विवाद को जन्म नहीं दिया जितना कि इस हिंदू संहिता विधेयक ने और उत्तेजना, पूर्वाग्रह, मनोविकार तथा अंधविश्वास सभी हमारी सूझबूझ पर काली छाप डाल रहे हैं। देश के लिए और सदन के लिए भी अंधविश्वासों और संदेहों से इतने उत्तेजित वातावरण में विधेयक के गुण-दोष के आधार पर संतुलित निष्कर्ष पर पहुँच पाना थोड़ा कठिन है।
इस विधान के आलोचकों को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है। सबसे पहले वे लोग हैं और जिसमें माननीय उपाध्यक्ष महोदय भी सम्मिलित हैं जिनका मौलिक रूप से और यथार्थतः यह मानना है कि हम लोग समय से आगे चल रहे हैं और इस प्रकार के विधान को अंगीकार करने से हमें क्षति होगी और इससे हिंदू समाज को अपूरणीय क्षति होगी। दूसरे वर्ग में वे लोग हैं जो रात-दिन इस विधान के बनाने वाले लोगों की आलोचना करते हैं और उनके लिए इस बात का महत्व नहीं है कि क्या कहा जा रहा है। बल्कि इस बात का महत्व है कि ऐसा कौन कह रहा है। यह सर्वविदित है कि हमारी अधिकांश जनसंख्या अशिक्षित है और वे इन दो अतिवादियों के बीच झूल रहे हैं। यह भी सर्वविदित है कि जब एक देश स्वतंत्रता प्राप्त करता है तो जनता सहज ही एक समान विधियों और मौजूदा कानूनों के संहिताकरण की आवश्यकता महसूस करती है। यह राष्ट्रीय जागरण के साथ-साथ घटित हुआ है। यह कोई पहला अवसर नहीं है जब कि भारतीय जनता ने विधानमंडलों में अपने जनप्रतिनिधियों के माध्यम से ऐसी इच्छा को प्रकट किया है। सन् 1921 में ही मध्य प्रान्त के एक सदस्य ने इस आशय का एवं संकल्प प्रस्तुत किया था। श्री के. जे. बागड़े और श्री तेजबहादुर सप्रू तत्कालीन विधि सदस्य थे। यह संकल्प इस आशय का था कि हिंदू विधि की सभी विभिन्न शाखाओं को, जैसा उस समय थीं, को समुचित रूप से संहिताबद्ध करना चाहिए। समय-समय पर केन्द्रीय विधानमंडल में यह प्रश्न उठाया गया था और मैं जानता हूँ कि श्री गंगानाथ झा जैसे प्रख्यात व्यक्ति ने भी सदन की पहल पर यह पूछते हुए प्रश्न रखा था कि हिंदू विधि का संहिताकरण कब होगा। उल्लेखनीय है कि वह समय राष्ट्रीय जागरण का काल था और कानून का संहिताबद्ध करने की यह इच्छा उस समय भी मुखर थी।
ऐसा विचार प्रकट किया गया है कि इस संहिता को गैर-हिंदुओं पर भी लागू किया जाए, ईसाइयों और मुस्लिमों और दूसरों पर भी लागू किया जाए ताकि एक समान नागरिक संहिता हो। संविधान के अनुच्छेदों का हवाला दिया गया है और यह कहा गया है कि इस संहिता से संविधान के कुछ अनुच्छेदों का उल्लंघन होता है। मुझे पूरा विश्वास है कि जब नागरिक संहिता के विचार के लिए प्रस्तुत किया