170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विधवा पुनर्विवाह की वकालत की थी और इसका घोर विरोध किया गया था। शारदा कानून पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। मैं स्वीकार करता हूँ कि शारदा कानून के कारण बाल विवाहों को बहुत हद तक रोका गया है इस शारदा कानून ने काफी हद तक हमारी इस बुरी प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया है। अतएवः मैं मानता हूँ कि हम अपने दृष्टिकोण में हमेशा विवेकशील रहे हैं। हमें वेदों और स्मृतियों का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए और हमें अपने समाज में सुधार लाने हेतु कानूनों की जरूरत है। लेकिन कल हमारे मंत्री जी द्वारा कही गई एक बात को मैं नहीं समझ सका हूँ। उन लोगों पर जिन्होंने सुझाव दिया था कि इस विधेयक को संपूर्णता में और पूरे समाज पर लागू करना चाहिए तो मंत्री जी हँस दिये थे। यदि हम अपने भेदभाव से बँटे समाज को इस तरह से गूँथना चाहते हैं, यदि हम एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें कोई वर्ग या जाति भेद नहीं होना चाहिए या जितना भेदभाव आज है वह नहीं होना चाहिए तब मैं यह कहना चाहता हूँ कि हमें इस तरह के कानून की जरूरत है जो बिना किसी भेदभाव के पूरे समाज पर लागू हो सके। कल माननीय मंत्री जी ने कुछ टिप्पणी की थी जो मेरे विचार में उनके लिए उपयुक्त नहीं है, यह संभव है कि मैं गलत हो सकता हूँ। मैंने सोचा कि वह कुछ उत्तेजित हो गए और अपना संयम खो बैठे या उन्होंने यह महसूस किया कि हम विधेयक के पास होने में टाँग अड़ा रहे हैं। लेकिन यह बात नहीं है। लेकिन बहुत से लोगों का यह विचार है और मैं भी उनमें से एक हूँ कि बेहतर होता यदि इस कानून को बिना किसी भेदभाव के पूरे समाज पर लागू किया जाता। माननीय मंत्री जी के मुताबिक यह अत्यधिक हर्ष का विषय है कि ऐसा विधेयक मात्र दो दिनों में पुनःस्थापित किया जा सका। यह बहुत ही अच्छा होगा यदि यह विधेयक आधे घंटे में ही पारित हो जाता है। यह हमारे माननीय मंत्री के लिए इतने जिम्मेदारीपूर्ण पद पर रहते हुए उन लोगो पर हँसना जिनके विचार उनके विचारों से मेल नहीं खाते थे। अच्छी बात नहीं थी। हमारे संविधान में यह स्पष्टतः कहा गया है, यह मूल अधिकारों से संबंधित अध्याय में नहीं हो सकता है लेकिन यह प्रस्तावना अध्याय में है :-
‘‘राज्य, भारत के सभी प्रदेशों में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।’’
हमारे संविधान में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है। आज हमारे सामने जो विधेयक प्रस्तुत किया गया है वह इस खंड के विपरीत है। वर्ग और जाति भेद के कारण हमें काफी हानि हुई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् हमने अपने संविधान का निर्माण किया और संविधान के पारित होने के पश्चात् यह पहला सामाजिक विधेयक है जो हमारे समक्ष प्रस्तुत किया गया है। इस सामाजिक विधेयक में हमें कुछ आदर्शों को समाविष्ट करना चाहिए था और वह आसानी से किया जा सकता था, सिर्फ इसे ही पूरे समाज पर लागू करना था। यदि इस विधेयक के कुछ खंडों को छोड़ दिया