हिंदू संहिता : जारी - Page 186

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जाए और अच्छे खंडों का चयन किया जाए तो एक ऐसा विध्ेयक तैयार किया जा सकता है जिसे पूरे समाज पर संपूर्णता से लागू किया जा सकता है। फिर, वे लोग जो आज इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं ऐसा नहीं करते।

एक और चीज है जो बिल्कुल साफ है। इस विधेयक में कई अच्छी बातें भी हैं। बल्कि मैं तो यह कहूँगा कि इसमें अच्छी बातों की प्रचुरता है और मतभेद की बातें बहुत कम हैं। मूलभूत बातों में एक महत्वपूर्ण बात है जिसे इस विधेयक में रखा गया है। विवाद का एक विषय यह है कि औरतों को भी संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार दिया जाना चाहिए। मेरे अपने मित्र श्यामनंदन सहाय का काफी सम्मान करता हूँ लेकिन उनका यह कहना कि हम लोग स्त्रियों को गृहस्वामिनी मानते हैं सिर्फ कहने में ही आसान है। मैं उनको यह बताना चाहता हूँ कि यह ‘‘तिजोरी आपकी है किंतु चाबी मेरे पास रहने दीजिए’’ की उक्ति के समान है। हमने देखा है और हम संपत्ति पर स्त्रियों के अधिकारों के नहीं होने से उत्पन्न परिणामों के बारे में जानते हैं। हम अनेक स्त्रियों की जीवन की दशा को जानते हैं। क्या श्री श्यामनंदन सहाय और उन्हीं की भाँति-विचार रखने वाले दूसरे लोग इस बात से इंकार करेंगे कि कई धनाढ्य परिवारों की सती और सम्मानित स्त्रियों को संपत्ति नहीं रह जाने के कारण सम्मान और हैसियत दोनों से हाथ धोना पड़ा है? अतएव जहाँ तक मेरा प्रश्न है, संपत्ति में स्त्रियों के उत्तराधिकार के बारे में मेरा कोई मतभेद नहीं है। प्रश्न यह है कि उन्हें पिता की संपत्ति में से या श्वसुर की संपत्ति में से उनका हक मिले।

ज्ञानी जी. एस. मुसाफिर (पंजाब) : ससुर की संपत्ति में कोई आपत्ति नहीं है।

सेठ गोविन्द दास : इसलिए यह एक बड़ा प्रश्न है। आज हमारा विवाह का रिवाज ऐसा है कि स्त्री को पति के घर जाना पड़ता है। एक समय ऐसा भी था जबकि इस समाज में विवाह की पद्धति का कोई अस्तित्व नहीं था महाभारत में उद्दालक और श्वेतकेतु की कहानी से साफ तौर पर पता चलता है कि एक समय था जब विवाह नहीं होते थे। फिर मातृसत्ता का समय आया, जिसमें पति-पत्नी के घर जाया करता था और उनकी संतानों में से स्त्री संतान संपत्ति का उत्तराधिकारी प्राप्त करती थी। अभी भी कुछ स्थानों पर वह प्रथा प्रचलित है जैसे मालाबार। फिर पितृसत्ता का समय आया। आज हमारी समाजिक संरचना मुख्यतया पितृसत्तात्मक है न कि मातृसत्तात्मक और इस तरह के समाज में पिता की संपत्ति में स्त्री को उत्तराधिकारी बनाना किस सीमा तक उचित होगा, यह विवाद का विषय है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि जहाँ तक संपत्ति में स्त्रियों के उत्तराधिकार का प्रश्न है, यह अवश्य होना चाहिए कि एक अविवाहित स्त्री को उसके पिता की संपत्ति में तथा एक विवाहित स्त्री अपने पति के पिता की संपत्ति में हकदार होगी।