172 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसके अतिरिक्त भी इस विधेयक की कुछ धाराएँ हैं जिनके बारे में मतभेद हो सकते हैं। जहाँ तक इस विधेयक का संबंध है, इसमें दो बातों का समावेश है। पहला, विभिन्न मौजूदा कानूनों को संयोजित कर दिया गया है। दूसरे, सामाजिक सुधार के प्रयोजन से कुछ धाराएँ जोड़ दी गई हैं। जैसा कि मैंने अभी-अभी कहा था यह उचित होता यदि यह विधेयक अभी प्रस्तुत नहीं किया जाता। जब हमारे राष्टपत्रि डॉ. राजेन्द्रप्रसाद काँग्रेस के अध्यक्ष थे तो उन्होंने ऐसे विधेयक को नहीं प्रस्तुत करने की वकालत की थी और इसलिए उनके अनुसार दि यह विधेयक नहीं आया होता तो अच्छा होता। लेकिन अब इसे इतनी दूर तक ले आया गया है कि यदि इस अवस्था में इसे वापस लिया जाता है तो इससे कई तरह के अर्थ निकाले जाएंगे। अगला चुनाव जनता के सामने है। मैं चुनावों को बहुत ज्यादा महत्व नहीं देता हूँ और मेरा विश्वास है कि काँग्रेस इतनी निष्प्रभावी नहीं है कि यदि यह विधेयक पारित हो जाता है और जनता को कहा जाता है कि काँग्रेस ने यह किया है तो काँग्रेस पार्टी हार जाएगी। लेकिन यदि काँग्रेस इतनी तुच्छ है तब इसे इस प्रकार हराया जा सकता है। मैं तो कहूँगा कि जितनी जल्दी यह हार जाए उतना ही अच्छा है। इसलिए मेरा उनसे मतभेद है जो अपने सामने चुनावों को रखते हैं तथा उसी दृष्टिकोण से चलते हैं। मुझे सन् 1923 और सन् 1926 की याद है जब स्वराज्य पार्टी चुनावों में पहली बार उतरी थी। मैं जमींदार पार्टी से केन्द्रीय विधानसभा के लिए प्रत्याशी था और यह कहा जा रहा था कि काँग्रेस पार्टी तथा जमींदारों के बीच काफी दूरी है, कि जमींदार काँग्रेस को वोट नहीं देंगे। लेकिन तब भी किसी ने मुझे चुनौती नहीं दी। तत्पश्चात् मैं 1925 में पुनः कौंसिल ऑफ स्टेट के लिए खड़ा हुआ और उस समय भी यह शंका व्यक्त की गई कि क्या कौंसिल ऑफ स्टेट के मतदाता काँग्रेस के लिए वोट देंगे। सर मानेक जी दादा भाई और सर हरिसिंह गौड़ ने मेरा विरोध किया किंतु तब भी मुझे तीन-चौथाई वोट मिले। अतएव, मैं काँग्रेस को छुई-मुई संस्था नहीं मानता हूँं जिसकी हमारे इस विधायक के पारित कर देने से सत्ता घट जाएगी। इस सोच से हमेशा चुनावों का भय बना रहेगा। मेरा विचार यह है कि यदि हम इस विधेयक के हिमायती हैं और यदि हमारे नेता, हमारे प्रधानमंत्री समझते हैं कि इसे पारित होना चाहिए तो यदि चुनावों के भय से इसे नहीं पारित करते हैं तो यह हमारी गलती होगी। यदि हम इसे पारित करना नहीं चाहते हैं तो यह अलग है। किंतु यदि हम चुनावों के भय से इसे पारित नहीं करते हैं तो इससे बुरा कुछ नहीं होगा। और मैं उनको भी एक बात कहना चाहूँगा जो चुनावों के भय से इसे पारित होने नहीं देखना चाहते हैं। यदि अभी विधेयक को पिरत नहीं किया जाता है, तो वे लोगों को यह कहते हुए सुनेंगे कि यदि काँग्रेसी सत्ता में लौटते हैं तो वे ऐसी चीजें पारित करेंगे जो यहाँ तक कि विधेयक में भी नहीं था। लोगों के सामने इतना भयावह चित्र प्रस्तुत किया जाएगा