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जिसकी हम अभी से कल्पना तक नहीं कर सकते हैं। अतएव हमें इस विधेयक से लेन देन या चुनावों के भय से नहीं निपटना होगा। हमें इसके गुण-दोषों के आधार पर इससे निपटना होगा। इस संबंध में मैं माननीय मंत्री के सामने जो अभी-अभी मैंने कहा है उसे दोहराऊँगा कि इस विधेयक के दो भाग हैं : एक भाग संयोजन का है और दूसरा भाग समाज सुधारों का है। हम लोग समाज सुधारों के कई प्रावधानों के पूर्ण विरोध में हैं। मैं चाहता हूँ कि देश की मौजूदा स्थिति में सभी ऐसे प्रावधानों को छोड़ देना चाहिए क्योंकि इनका समावेश करना समयोजित नहीं होगा। वैसी बातों जिन पर मतभेद हैं को छोड़ दिया जाए और जिनका संयोजन करना है उन्हें लिया जा सकता है। मैं इन दोनों चीजों में काफी अंतर मानता हूँ कि जहाँ तक संयोजन का प्रश्न है हमें यह करना चाहिए और उन प्रावधानों जिन पर हममें मतभेद नहीं हैं को पारित किया जा सकता है। जो प्रावधान विवादास्पद हैं और जिन पर देश में आंदोलन चल रहा है को छोड़ देना चाहिए। हमें आगामी चुनाव होने देना चाहिए जिसमें वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रतिनिधि चुने जाएंगे। यदि उस समय हम समाज सुधारों से संबंधित प्रावधानों को लाना आवश्यक समझेंगे तो इसे हम इस विधेयक में संशोधन के रूप में पुनःस्थापित कर सकते हैं और उन्हें पारित कर सकते हैं। इस तरह के दृष्टिकोण से दोनों बातें हो जाती हैं। इससे कानूनों का संयोजन हो जाएगा और इससे हम विवादास्पद मुद्दों से भी बच जाएंगे।
एक और चीज की जानी चाहिए मेरे मित्र श्री जसपत राय कपूर ने जैसा कहा, इसे लोगों पर अनिवार्य रूप से लागू नहीं किया जाए। निःसंदेह इस तरह के समाज सुधार कानून बनाकर किए जाने चाहिए। लेकिन इसके पक्ष में जनमत तैयार करना अनिवार्य है। यह गलत परामर्श नहीं होगा कि इसे केवल उन्हीं लोगों पर लागू किया जाए जो इसे स्वीकार करते हैं और इसे पूरी आबादी पर लागू करने का प्रयास नहीं किया जाए। अतएव मैं पुनः कहूँगा कि विधेयक के लिए यह अच्छा होता कि यह हमारे सामने बिल्कुल आता ही नहीं। मेरा यह भी विचार है कि अपने संविधान के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए हम आने वाले समय में श्री जसपत राय कपूर या दूसरों के द्वारा लाए गए संशोधनों के अनुरूप इस विधेयक को पूरे समाज पर लागू कर सकें, हमें इसके लिए अवश्य प्रयास करना चाहिए। इसके साथ ही हमें इसे लोगों पर जबरदस्ती थोपने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए। इसे केवल उन लोगों पर लागू किया जा सकता है जो इसे स्वीकार करते हैं, अन्यथा वर्तमान परिस्थितियों में हम इसके विवादास्पद प्रावधानों को छोड़ सकते हैं और जहाँ तक संयोजन का मामला चलता है, हमें यह उस सीमा तक करना चाहिए जहाँ तक हम में मतभिन्नता नहीं है।
* श्री हुसैन इमाम : श्रीमान्, आज मैं भी अपनी मातृभाषा में बोलना चाहता हूँ
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क्योंकि सेठ गोविन्द दास ने बहुत ही बढि़या भाषण दिया है।
* संसदीय वाद-विवाद, खंड- VIII, भाग- II, 7 फरवरी, 1951 पृष्ठ 2550-557