हिंदू संहिता : जारी - Page 189

174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रो. रंगा : अंग्रेजी में क्यों नहीं बोलते है जिससे कि हम समझ सकें?

श्री हुसैन इमाम : हिंदू संहिता विधेयक पर विचार करते हुए सामान्य तौर पर चर्चा में मैंने भाग नहीं लिया होता क्योंकि यह विधान हमारे भ्रातृ समुदाय पर प्रयोज्य है और इसलिए उन्हें अपने लिए अपनी इच्छानुसार फैसला करने का अधिकार होना चाहिए।

श्री त्यागी (उत्तर प्रदेश) : लेकिन संशोधन के दायरे में आप भी आते हैं।

श्री हुसैन इमाम : यहीं कारण है कि मैं बोलने के लिए खड़ा हुआ हूँ। मेरे कुछ माननीय मित्र हमें इस विधान की सीमा में लाने के लिए चिन्तित हैं। ठीक है, हमारी ओर से समान संहिता के दायरे में आने से कोई आपत्ति नहीं है। बशर्तें कि यह हमारी प्रथा से आगे होता। लेकिन मेरी शिकायत है कि यह अवश्य ही पिछड़ा हुआ है और आप हमें बुलाकर उसी स्तर तक नीचे पहुँचाना चाहते हैं जहाँ आप स्वयं पहुँच गए हैं। अतएव, मैं आपके स्तर तक नीचे जाने के लिए माफी चाहूँगा।

मैं जिक्र करना चाहता हूँ कि हिंदू संहिता विधेयक के पीछे एक लम्बा इतिहास है। इसके एक चरण में मुझे 1944-45 में नियुक्त की गई हिंदू लॉ कमेटी में शरीक होने का अवसर मिला था। क्योंकि मुझे उनके साथ सहानुभूति थी जो स्त्रियों की स्थिति में सुधार के काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं। मेरा विश्वास है कि कोई भी देश या समाज आगे नहीं बढ़ सकता है यदि इसकी जनता दबी-कुचली रहे। यह अत्यन्त आवश्यक है कि कानून के समक्ष और उत्तराधिकार के मामले में तथा अन्य बातों में सबकी बराबरी हो। लेकिन दूसरों की भावनाओं की उपेक्षा करना हमारी ओर से व्यर्थ होगा। जैसा मैं स्वयं के लिए सोच सकता हूँ वैसा ही सोचिए हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि दूसरे क्या महसूस कर रहे हैं और जैसा कि श्रीमान् आपने अत्यन्त तीक्ष्णता से कहा है कि यह अत्यन्त आवश्यक है कि किसी तरह की तानाशाही नहीं होनी चाहिए।

माननीय विधि मंत्री ने संविधान सभा में, उस स्मरणीय दिन को जबकि हमने संविधान के निर्माण का काम पूरा किया, अपने भाषण में जो कहा था वह इस प्रकार है-

‘‘भारत जैसे देश में जहाँ प्रजातंत्र को इसके लंबे समय तक व्यवहार में न लाने के कारण कुछ नया ही समझा जाए : यह कदाचित संभव है कि इस बात का खतरा है कि प्रजातंत्र तानाशाही को जन्म दे। यह कदापि संभव है कि नवजात प्रजातंत्र का स्वरूप तो बना रहे किंतु वास्तव में यह तानाशाही को जन्म दे दें। यदि चुनावों में मतदाताओं का झुकाव एक ही ओर हो जाए तो दूसरी संभावना को वास्तविकता में बदलने का खतरा और अधिक है।’’