हिंदू संहिता : जारी - Page 190

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मैं उनके भाषण का दायित्व उन्हीं को सौंपता हूँ और यह पूछता हूँ कि क्या भारत की 36 करोड़ जनसंख्या को किसी कानून के क्षेत्र में अनिवार्य रूप से आने के लिए निर्देश देना इस सदन की तानाशाही है या नहीं, ठीक उसी तरह से जैसा कि पुरातन कट्टरवादी समाज के अधिक आधुनिक लोगों और आगे बढ़ने देना का अधिकार नहीं देता था।

यह एक तानाशाही है जिसे अल्पसंख्यक बहुत बड़े बहुतसंख्यक पर लादने जा रहे हैं। मैं अपनी बहनों और सुधारवादी भाइयों से कहना चाहता हूँ कि उन्हें दिल जीतना चाहिए। हर चीज में फलने-फूलने की पूरी गुंजाइश है। उनके सामने पूरा मैदान खाली है। मैं समझता हूँ कि कट्टरपंथ न केवल आक्रामक है, बल्कि यह रक्षात्मक भी है - और सुधारवादियों के वेश में हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। यह अपनी गति तेजी से खोते जा रहे हैं। हमारे यहाँ अटल पिंड से लगने वाले अप्रतिरोध्य बल की सतत् द्विविधा है। लेकिन यह पिंड दिन-प्रतिदिन हल्का और अधिक हल्का होता जा रहा है और इसकी जड़ें हर दिन कमजोर होती जा रही हैं। अतएव, यह कट्टरवाद दृढ़ नहीं रह जाएगा, जैसा कि यह पहले था। लेकिन क्या यह आवश्यक है कि सुधारवादी को आक्रामक बनना चाहिए? क्या उन्हें पुराने कट्टरपंथियों के

खेल को खेलना चाहिए और उन्हें वह सब थोपने का प्रयास करना चाहिए जिसे वे तो लोगों के लिए सर्वोत्तम समझते हैं पर लोग इसे सर्वोत्तम नहीं बल्कि सबसे घटिया मानते हैं? आपको ऐसा क्यों करना चाहिए? यह प्रश्न है और इस प्रश्न में मेरा समुदाय भी शरीक होता है।

हम समझते हैं कि हमारी विधि प्रणाली और धन के वितरण की पद्धति ज्यादा प्रजातांत्रिक और ज्यादा समाजवादी है और इससे ज्यादा यदि मैं ऐसा कहूँ तो यह हमारे समक्ष प्रस्तुत विधान में प्रस्तावित प्रणाली से ज्यादा साम्यवादी है।

मैं सोचता हूँ कि खंड 2 में प्रस्तावित प्रमुख संशोधनों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। सर्वप्रथम, मुख्यतः समेकित सूची की संशोधन संख्या 13 और 14 इसकी प्रयोज्यता को बढ़ाना चाहता है। पूरक सूची की संशोधन संख्या 13 का भी प्रयोजन यही है। फिर कतिपय संशोधनों जैसे संख्या 18 के द्वारा इसकी प्रयोज्यता को कम करने की माँग की गई है। इसके बाद यह तीसरी श्रेणी भी है जो यह चाहती है कि इसकी प्रयोज्यता केवल उन्हीं लोगों तक सीमित रहे जो इसके दायरे में आना चाहते हैं। मैं सोचता हूँ कि श्री जसपत राय द्वारा दिया गया सुझाव एक बहुत ही अच्छा माध्यम होगा और इस पर सभा में गंभीर विचार हो सकता है - भले ही सभा के समक्ष लाए गए डॉ. अम्बेडकर के संशोधित संहिता से श्रेष्ठ संहिता लाने के हमारे प्रयासों में सहायक न हो। उन्हें अपनी इच्छा के प्रतिकूल कुछ रियायतें देनी पड़ी थीं।