हिंदू संहिता : जारी - Page 193

178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के बावजूद भी वह कसौटी जिसके द्वारा हम प्रजातंत्र को परख सकते हैं। यदि उसे हटा दिया जाता है तो प्रजातंत्र निरर्थक, जीवन विहीन और पुतला मात्र बन कर रह जाएगा। क्योंकि हिटलर ने क्या किया था? उसने चुनाव कराया लेकिन एक ऐसी व्यवस्था की गई जिसके द्वारा चुनावों को....(एक माननीय सदस्य के अनुसार सरल).... बना दिया गया, सरल नहीं बल्कि उन्हें तानाशाह की तानाशाही को ढँकने का आवरण बना दिया गया। यदि हम इस उक्ति को कि मतदाता को कोई अधिकार नहीं है और संसद के सदस्यों के लिए यह अधिकार सुरक्षित कर दिया जाए कि वे जैसा चाहें फैसला कर लें और जिस तरह से करना चाहें तो वही बात यहाँ भी होगी।

मैं पुनः एक तथ्य का जिक्र करूँगा, इस सदन के अधिकार की नहीं केन्द्रीय विधानमंडल में पिछले बीस वर्षों से होने के नाते मैं इस विधानमंडल की शक्ति के बारे में प्रश्न करने वाला अंतिम व्यक्ति होऊँगा - लेकिन क्या इस प्रकार के विधान को लोकप्रिय रूप में निर्वाचित प्रतिनिधियों जो इस सदन में मतदाता के सीधे अधिदेश से आएंगे पर उसे छोड़ देना बेहतर नहीं होगा? मैं इस का सुझाव जनता की इच्छा को जानने के लिए एक पद्धति के रूप में दे रहा हूँ। जब तक हम प्रजातंत्र को दिखावटी रूप से भी मान रहे हैं हमारा सर्वोच्च स्वामी और हमारे भाग्य का निर्णय करने वाला मतदाता ही है। इसका सबों पर प्रभाव पड़ने वाला है। मैं सदन को चेतावनी देना चाहता हूँ कि जैसा कि विधेयक के विरुद्ध प्रवर समिति द्वारा रिपोर्ट की गई। संविधान में परिवर्तन के परिणामस्वरूप हम लोग प्रत्येक की व्यक्तिगत संपत्ति को प्रभावित करने जा रहे हैं। एक एकड़ जमीन का छोटा-सा फार्म भी इस नए विधेयक के दायरे से बाहर नहीं होगा, क्यों अब भूमि को केन्द्रीय विधानमंडल के अधिकार क्षेत्र में ले लिया गया है। जबकि प्रवर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक इस विधेयक का प्रभाव जनसंख्या के मात्र पन्द्रह से सोलह प्रतिशत पर ही पड़ना था। आपके लिए क्या यह उचित है, क्या यह प्रजातांत्रिक है कि बिना प्रवर समिति से परामर्श किए इस विधेयक की प्रकृति को इस बात से बदल दिया कि अब यह भारत के पूरे सौ प्रतिशत नागरिकों को प्रभावित करेगा क्योंकि जमीन को अब केन्द्रीय विधानमंडल के दायरे में ले लिया गया है? मैं अत्यंत आदरपूर्वक सुझाव देना चाहता हूँ कि इस विधानमंडल के लिए अपने आत्मसम्मान को सामने रखते हुए प्रवर समिति के द्वारा इसके अध्ययन किए जाने की औपचारिकता को भी पूरा किए बिना इतना आगे जाना उचित नहीं होगा। मैं जानता हूँ कि बह चुके दूध पर गुजारिश करने का कोई लाभ नहीं है। लेकिन मैं इस विधेयक को निर्वाचनात्मक बनाने के पक्ष में ये सभी तर्क दे रहा हूँ। मैं नहीं कहता हूँ, इतना आगे बढ़ जाने पर और विगत में इतनी गलतियाँ करने पर अब