हिंदू संहिता : जारी - Page 194

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आपको इसे दरकिनार कर देना चाहिए। लेकिन आप में कम से कम यह कहने की शालीनता होनी चाहिए कि आप जनता को अपना विकल्प चुनने का अवसर देंगे कि क्या वे इस अधिनियम के दायरे में आना चाहते हैं या नहीं। यह विकल्प या तो आम हो सकता है जैसा कि मेरे माननीय मित्र श्री जसपत राय कपूर ने सुझाया है या यह प्रतिबंधित हो सकता है जैसा कि मैं अभी सरकार के विचारार्थ सुझा रहा हूँ। सरकार के पास वर्तमान अनुमानों के अनुसार पर्याप्त समय है। यह विधेयक अभी तत्काल कार्यान्वित होने नहीं जा रहा है। अतएव सरकार के लिए अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करना संभव है। मैं अत्यन्त विनम्रतापूर्वक सरकार से अपील करूँगा कि इस पर उपयुक्त तरीके से विचार करने और इसे पूरी तरह निर्वाचनात्मक बना दें और यदि यह संभव नहीं है तो कम से कम इसे अंशतः ही निर्वाचनात्मक बना दें और अनिवार्य नहीं रखें। अन्यथा यह तानाशाही होगी, प्रजातंत्र नहीं। (अध्यक्ष महोदय पीठासीन हुए)

माननीय अध्यक्ष : अब हम आधे घंटे की चर्चा शुरू करेंगे।

श्री गाडगिल : माननीय सदस्यों ने आज सुबह चाँदनी चौक में हुए किसी दुर्घटना के बारे में सभा को जानकारी देने का अनुरोध किया था।

माननीय अध्यक्ष : मैं सोचता हूँ कि इस पर अभी की बजाए 5.30 बजे चर्चा करना बेहतर होगा। हिंदू संहिता : जारी

खंड 2 (संहिता की प्रयोज्यता) : जारी।

श्री नजीरुद्दीन अहमद (पश्चिमी बंगाल) : मेरा व्यवस्था का प्रश्न है....

श्रीमती दुर्गाबाई (मद्रास) : क्या मैं यह जान सकती हूँ कि माननीय सदस्य किस विषय पर व्यवस्था का प्रश्न उठाने जा रहे हैं? सदन के सामने ऐसा कोई मसला नहीं है जिस पर व्यवस्था का प्रश्न किया जा सकता है। सबसे पहले प्रस्ताव को रखना चाहिए।

श्री सोंधी (पंजाब) : आप कौन होते हैं? आप पीठासीन नहीं हैं (व्यवधान)।

श्रीमती दुर्गाबाई : सबसे पहले प्रस्ताव रखा जाए।

* सं. वा. वि. खंड- XV, भाग- II, 17 सितम्बर, 1951, पृष्ठ 2674-2738