हिंदू संहिता : जारी खंड प्रति खंड चर्चा प्रवर समिति - Page 20

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‘‘लोकव्यवस्था विषयक, नैतिकता और स्वास्थ्य.............का अर्थ यह नहीं.........।’’

श्रीमती दुर्गाबाई (मद्रास) : व्यवस्था के प्रश्न के नाम पर क्या माननीय महोदय को मामले के गुणों पर बहस करने की अनुमति दी जाएगी?

माननीय अध्यक्ष : वे तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं और उन्हें ऐसा करने का अधिकार है। असहमत होने वाले सदस्यों को असहिष्णु नहीं होना चाहिए।

श्री सोनवाने (बंबई) : उनका व्यवस्था का क्या प्रश्न है?

माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्य वे जो कह रहे हैं उसे सुनें।

श्री सोनवाने : क्या उन्हें तर्क करने की अनुमति दी गई है।

माननीय अध्यक्ष : मैं बिना माने किसी भी सदस्य को नहीं रोक सकता वह क्या कहना चाहता है और जब तक वह कहेगा नहीं मैं नहीं जान सकता। इसलिए जानने के लिए माननीय सदस्य क्या कहना चाहते हैं मुझे उसे सुनना होगा और यह ही लोकतंत्र का तरीका है जिस पर हमें चलना है।

श्रीमती दुर्गाबाई : लेकिन क्या उन्हें विधेयक के आवश्यक खंडों के उल्लेख की अनुमति दी जाएगी।

माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्य जानती हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जो इस विषय पर तर्क प्रस्तुत करना चाहता है से बोलने की स्वतंत्रता है : यद्यपि अगर मैं देखूँ कि माननीय सदस्य स्वतंत्रता का गलत उपयोग कर रहे हैं या बार-बार एक ही तथ्य दोहरा रहे हैं, तो मैं निश्चित रूप से उसे रोक दूँगा।

श्री राजबहादुर (राजस्थान) : महोदय मैं जानना चाहता हूँ कि अनुशासन में क्या माननीय सदस्य संविधान में कुछ अनुच्छेदों का उल्लेख करते हुए अशोभनीय भाषा का प्रयोग कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि लोकाचार से स्वास्थ्य आदि विषय बिना मतलब के शब्द हैं। क्या वे इस प्रकार की टिप्पणी कर सकते हैं?

श्री आर. के. चौधरी : महोदय, मेरे विचार से जब किसी सम्यक बिन्दु का प्रश्न उठे और अध्यक्ष महोदय उस सम्यक बिन्दु को सुन रहे हों तो किसी भी माननीय सदस्य को अवरोध उत्पन्न नहीं करना चाहिए।

माननीय अध्यक्ष : शांति! शांति!

श्री नजीरुद्दीन अहमद : मेरे विचार से अनुच्छेद 25 के खंड 1 में आए शब्द : ‘‘बशर्तें की लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य’’ का वास्तव में कोई गम्भीर अर्थ